हिमालय की पारिस्थितिकी का अध्ययन जरूरी : बर्थवाल

नैनीताल। कुमाऊं विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. सीपी बर्थवाल ने कहा कि हिमालय और इससे लगे क्षेत्रों के बेहतर भविष्य के लिए हिमालय की पारिस्थितिकी का अध्ययन जरूरी है। जिसके आधार पर ही नियोजित विकास की नीव रखी जा सकती है।
एटीआई में आयोजित सेमिनार के दौरान हुई भेंट में प्रो.बर्थवाल ने बताया कि हिमालयी क्षेत्र खासा संवेदनशील है। इसके सुनियोजित विकास के लिए विभिन्न पक्षों को जानना जरूरी है। उन्होंने कहा कि 1505 से 2007 तक हिमालयी क्षेत्रों में 26 भूकंप के बड़े झटके आ चुके हैं। जिससे ग्लेशियर के मूल स्वरूप में भी परिवर्तन हुआ। उत्तराखंड में आई आपदा का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि नदियों के किनारे पर हुए व्यावसायिक निर्माण, सड़क चौड़ीकरण, भू माफियाओं के माध्यम से वन संपदा की चोरी, खनन ने आपदा को कई गुना बढ़ा दिया। एक अध्ययन के आधार पर उन्होंने कहा कि 2005 तक उत्तराखंड का 65 फीसदी भू भाग वनाच्छादित था, जो वर्ष 2011 में घटकर 45 फीसदी रह गया है। यही नहीं पन बिजली के लिए 292 स्थानों पर माइनिंग हुई।
प्रो.बर्थवाल ने कहा कि यह प्रदेश का दुर्भाग्य है कि 2007 में गठित डिजास्टर मैनेजमेंट अथारिटी की अब तक मीटिंग तक नहीं हुई है।

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