
आनी (कुल्लू)। आनी के जलोड़ी जोत के नजदीक प्राकृतिक सरेऊलसर झील जहां विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी है, वहीं क्षेत्रवासियों में भी इसके प्रति आगाद श्रद्धा है।
दस हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित सरेऊलसर झील जलोड़ी जोत के करीब पांच किमी दूर है। यह एक किमी दायरे में फैली है। आनी और बंजार क्षेत्र के लोगों में इसके प्रति गहरी आस्था है। झील के अंदर नौ नागों की माता बूढ़ी नागिन वास करती हैं। लोगों का मानना है गाय के पहले घी को यहां चढ़ाने से माता प्रसन्न होती हैं और उनके घर में कभी अन्न धन की कमी नहीं रहती। घी चढ़ाने की इस परंपरा का निर्वहन लोग आज भी बखूबी कर रहे हैं। एक दंतकथा के अनुसार क्षेत्र के दो तांत्रिकों ने झील को सुखाने का प्रयास किया था। अपनी तपस्या से झील को करीब आधा सुखाने के बाद उन दोनों की मौत हो गई। झील की एक और अनोखी सच्चाई है कि यह हमेशा निर्मल रहती है। इस झील में कभी एक तिनका भी नहीं ठहर सकता। यहां मौजूद एक विशेष चिड़िया जिसे स्थानीय भाषा में ‘आभी’ कहते हैं, वह झील में तिनका पड़ने पर उसे अपनी चोंच से उठा कर किनारे करती है। इस तरह आभा झील की रखवाली करती है, जिसे वहां जाने वाले आज भी देख सकते हैं। गर्मियों में लोग यहां झील को निहारने पहुंचते हैं। यहां कई लोगों ने अपने आनंद के लिए झील में तैरना भी शुरू किया था। कुछ लोग झील में डूब गए, जिसे देखते हुए यहां की कमेटी ने अब यहां तैरना वर्जित कर दिया है। करीब दस वर्ष पूर्व यहां एक युवक झील में डूब गया था। परिवारजनों ने युवक को निकालने के लिए यहां गोताखोर लाए, लेकिन असफलता ही हाथ लगी। झील की गहराई के बारे में गोताखोर अनुमान नहीं लगा पाए। माता से जुड़ी कई दंतकथाएं आज भी मौजूद हैं, जिससे क्षेत्र की जनता भलीभांति परिचित है। स्थानीय देवता समय-समय पर माता की झील के पास आकर शक्तियां अर्जित करने भी पहुंचते हैं।
