हिमाचल हाईकोर्ट ने ग्रुप इंस्ट्रक्टरों की वरिष्टता सूचि पर रोक के साथ साथ सरकार को दिया नोटिस

हिमाचल हाईकोर्ट ने ग्रुप इंस्ट्रक्टरों की वरिष्टता सूचि पर रोक के साथ साथ सरकार को दिया नोटिस

प्रदेश हाईकोर्ट ने तकनीकी शिक्षा विभाग में ग्रुप इंस्ट्रक्टरों की संशोधित वरिष्ठता सूची के कार्यान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी है। न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की अदालत ने यह आदेश तारा चंद धीमान और अन्य मामले की सुनवाई के दौरान दिए हैं। अदालत ने इस मामले में राज्य सरकार और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अगली सुनवाई अब 18 मई को होगी। याचिकाकर्ता आईटीआई में प्रिंसिपल के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने सरकार की ओर से 8 अप्रैल 2026 को जारी उस कार्यालय ज्ञापन को चुनौती दी है, जिसके माध्यम से ग्रुप इंस्ट्रक्टरों की अंतिम वरिष्ठता सूची को संशोधित किया गया था।

यह सूची 31 दिसंबर 2025 तक की स्थिति के आधार पर तैयार की गई थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि सरकार ने 8 अप्रैल का आदेश पुराने मामले (जितेंद्र सिंह बनाम राज्य) में दिए गए निर्देशों के अनुपालन में जारी किया है, लेकिन वर्तमान याचिकाकर्ताओं को उस मामले में प्रतिवादी नहीं बनाया गया था। तर्क दिया गया कि अदालत ने जो आदेश दिए हैं, वे याचिकाकर्ताओं की अनुपस्थिति में लिए गए, जिससे उनके हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इस आदेश से उन शिक्षकों को बड़ी राहत मिली है, जो वर्तमान में प्रिंसिपल के रूप में कार्यरत हैं और जिन्हें डर था कि नई वरिष्ठता सूची उनके कॅरिअर और पदोन्नति की संभावनाओं को प्रभावित कर सकती है।

गौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की एकल पीठ ने एक अन्य मामले में ग्रुप इंस्ट्रक्टरों को नियुक्ति की पात्रता वाली पुरानी तारीख से पदोन्नति का लाभ देने के आदेश दिए हैं। लेकिन इस मामले में याचिकाकर्ताओं को पार्टी नहीं बनाया गया। इस मामले में अदालत ने स्पष्ट किया था कि यदि पद खाली थे और उम्मीदवार पात्र थे, तो उन्हें डीपीसी की देरी का नुकसान नहीं होना चाहिए। अदालत ने सरकार को 4 महीने के भीतर रिव्यू डीपीसी आयोजित करने के निर्देश दिए थे। सरकार ने अदालत के आदेशों की अनुपालन करते हुए इस वरिष्ठता सूची को जारी किया है, जिसे याचिकाकर्ता प्रिंसिपलों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी है।

पूर्णकालिक आकस्मिक सेवाओं को पारिवारिक पेंशन में जोड़ने पर रोक
प्रदेश हाईकोर्ट ने एकल न्यायाधीश की ओर से 27 जून 2025 को पारित उस आदेश के निष्पादन और संचालन पर रोक लगा दी है, जिसमें एक कर्मचारी की पूर्णकालिक आकस्मिक सेवा को पारिवारिक पेंशन के लिए अर्हक सेवा (क्वालीफाइंग सर्विस) के रूप में गणना करने के निर्देश दिए थे। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने इस मामले में प्रतिवादी को नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 29 जून को होगी। राज्य सरकार की ओर से दायर अपील में खंडपीठ अब कानूनी स्थिति स्पष्ट करेगी कि क्या नियमितीकरण से पूर्व की आकस्मिक सेवा को पेंशन लाभ के लिए जोड़ा जा सकता है या नहीं। खंडपीठ ने यह आदेश प्रदेश राज्य बनाम बिंबला देवी में दिया है। कर्मचारी रणबीर सिंह की नियुक्ति 1997 में अंशकालिक आधार पर हुई थी, जिसे 2002 में पूर्णकालिक आकस्मिक सेवा में बदला गया। विभाग ने 2003 में उनकी सेवाओं को नियमित किया। साल 2013 में उनकी मृत्यु हो गई थी। सरकार ने एकल जज के फैसले के खिलाफ डबल बेंच में अपील दाखिल की है। सरकार ने तर्क दिया कि सीसीएस पेंशन नियम 1972 के नियम 2 में आकस्मिक निधि से वेतन पाने वाले और दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को पेंशन लाभ से स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया है।

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