
धर्मशाला( आत्मा राम) भारत को अंग्रेजों से आजाद करवाने के बाद महात्मा गांधी के व्यक्तित्व के विदेशों में भी लोग कायल थे। महात्मा गांधी ने विदेशों में भी लोगाें के दिलों में अपनी जगह बनाई थी। 1947 में जैसे ही महात्मा गांधी पर आधारित चार टिकटों का सेट रिलीज हुआ तो टिकटों को विदेशों में भी पत्राचार में प्रयोग में लाया गया। हालांकि, टिकटों की मांग बढ़ने के बाद उस समय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने विदेशों में टिकटों को पत्राचार में प्रयोग करने पर प्रतिबंध लगा दिया था। सेट में पहली टिकट ‘डेढ़ आने’ की प्रकाशित हुई थी। इसके बाद टिकटों की विदेश में यकायक डिमांड बढ़ गई। इससे दूसरा सेट सीधा तीन आने का बिका था। ये टिकट भी देश और विदेश में पत्राचार में प्रयोग हुई थीं। टिकटों की डिमांड बढ़ने पर तीसरा सेट 12 आने का रिलीज हुआ। इस टिकट को भारत में अमीर लोग ही पत्राचार के लिए खरीदते थे। जबकि, विदेशों में इसकी डिमांड लगातार बढ़ती रही। डिमांड को ज्यादा देखकर चौथा सेट 10 रुपये में बिका था। सूत्रों की मानें तो भारत को आजाद करवाने के बाद महात्मा गांधी का व्यक्तित्व विदेशियों को अच्छा लगा था। इसी वजह से विदेशों में भी पत्राचार में महात्मा गांधी की टिकटें प्रयोग करना विदेशी अपनी शान समझते थे। भारत में भी 10 रुपये वाली डाक टिकट अमीर घराने के लोग पत्रों में लगाना अपनी शान समझते थे। 1947 में रिलीज हुई 10 रुपये की कीमत आज के मुकाबले हजारों रुपये है। उधर, मेजर रीतू कालरा ने महात्मा गांधी के व्यक्तित्व वाली टिकटों को संजोकर रखा है। उधर, फिलेटली टिकट ब्यूरो प्रभारी शिमला प्रेम लाल वर्मा ने कहा कि 15 अगस्त 1947 में देश को आजाद करवाने के बाद भारत में गांधी के व्यक्तित्व वाली चार टिकटों का सेट रिलीज हुआ। इसमें 10 रुपये वाली टिकट देश और विदेश में पत्राचार में प्रयोग में लाई गई।
