
सेब की बागवानी छोड़कर शमशेर और विनोद को अनार ने किया मालामाल
कुल्लू। ग्लोबल वार्मिंग और अन्य कारणों से जलवायु में आए परिवर्तन के कारण कुल्लू जिले के निचले हिस्सों में सेब उत्पादन गिरने लगा है। इससे बागवान और बागवानी विभाग के अधिकारी तथा वैज्ञानिक चिंतित हो उठे थे। लेकिन अब वैज्ञानिकों और जिले के निचले इलाकों के बागवानों ने इस चुनौती से पार पा लिया है। उन्होंने अनार के रूप में सेब का मजबूत विकल्प ढूंढ लिया है। अनार की खेती से इन क्षेत्रों के बागवान मालामाल हो रहे हैं। इन्हीं बागवानों में शामिल है गांव कुट्टी आगे के शमशेर सिंह और बजौरा के विनोद कुमार।
बजौरा स्थित क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र और कृषि ज्ञान केंद्र, कृषि विभाग और उद्यान विभाग के वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन तथा विभागीय योजनाओं से प्रेरित होकर अनार की खेती करने वाले शमशेर सिंह और विनोद कुमार हर साल लाखों कमा रहे हैं। शमशेर सिंह के अनुसार उनके पास करीब साठ बीघा भूमि है। पहले उनका सेब का बगीचा था। जलवायु परिवर्तन के कारण जब यह बगीचा खत्म हो गया तो उन्होंने कृषि और बागवानी वैज्ञानिकों की प्रेरणा से अनार का बगीचा तैयार किया। चार साल में इसमें फल लगना शुरू हो गए। पिछले वर्ष उन्होंने करीब सोलह लाख के अनार बेचे।
शमशेर ने बताया कि उद्यान विभाग के माध्यम से बागवानी तकनीकी मिशन और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत वित्तीय अनुदान पाकर उन्होंने अनार की खेती को अपनाया और विभागीय अधिकारियों तथा क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र बजौरा के वैज्ञानिकों का मार्गदर्शन मिलता रहा। हर साल लाखों की आय हो रही है। बजौरा के विनोद कुमार ने भी चार वर्ष पूर्व अनार के करीब सौ पौधे लगाए थे। बीते वर्ष उन्होंने करीब तीस हजार का अनार बेचा। इस सीजन में करीब पचास हजार आय की उम्मीद है। उद्यान विभाग के उपनिदेशक बीसी राणा ने बताया कि निचले इलाकों में बागवानों को सेब के विकल्प के रूप में अनार लगाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। जिले में इस समय करीब चार सौ हेक्टेयर भूमि पर अनार की खेती हो रही है। यहां अनार की प्रमुख किस्में काबुल कंधारी और सिंधुरी उगाई जा रही है। बागवानी तकनीकी मिशन और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत अनार लगाने के लिए बागवानों को प्रति हेक्टेयर तीस हजार की सब्सिडी दी जा रही है।
