
नई दिल्ली। विशेषज्ञ चिकित्सकों ने इस बात से इनकार किया है कि उत्तराखंड में आई आपदा में बड़ी संख्या में लोगों की मौत और शवों के जगह-जगह पड़े होने के बावजूद वहां किसी तरह की महामारी फैलने का खतरा है। उनका कहना है कि महामारी वहां रह रहे लोगों को स्वच्छ पानी और खाना न मिले, तब हो सकती है। राजधानी में आयोजित कार्यक्रम में विशेषज्ञ चिकित्सकों ने यह राय व्यक्त की।
हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल का कहना है कि बांग्लादेश की राजधानी ढाका और अमेरिका में आई बाढ़ के बाद इस तरह के हालात पर सर्वे कराया गया था। यही नहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानक के अनुसार भी ऐसी स्थिति में महामारी का खतरा नहीं होता। शव के सड़ने और बदबू से महामारी का खतरा नहीं होता। चिकित्सकों का कहना है कि यदि शव सड़ने के बाद उसे पानी में छोड़ दिया जाए और वही पानी, पेयजल के साथ मिल जाए तब संक्रमण और महामारी का खतरा रहता है। डॉ. अग्रवाल का कहना है कि यदि प्रभावित इलाके के लोगों को स्वच्छ पानी और खाना उपलब्ध कराया जाए, तो महामारी का खतरा नहीं है।
एमसीडी दक्षिण के स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. एनके यादव ने बताया कि ऊंचाई पर पानी जमने के बाद भी वहां डेंगू और मलेरिया का खतरा नहीं के बराबर होता है। डायरिया और फंगस न फैले, इस बात का ख्याल रखना चाहिए। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के डॉ. ओपी अग्रवाल का कहना है कि उत्तराखंड की आपदा में फंसी गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य की जांच पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए, क्योंकि ऐसी भीषण त्रासदी में फंसी गर्भवती के गर्भ में पल रहे बच्चे पर भी दुष्प्रभाव पड़ने का खतरा रहता है। उनकी काउंसलिंग की जानी चाहिए।
