
कुल्लू। देवभूमि कुल्लू में पौराणिक गीतों की रौनक लुप्त होने लगी है। पहाड़ी गानों में फिल्मी गीतों की धुनों का इस्तेमाल कुल्लू गीतों की मिठास को खत्म कर रहा है। पुराने गीत डिस्को नाटी में मिक्स हो गए हैं।
देवी-देवताओं की वास स्थली देवभूमि कुल्लू में मनाए जाने वाले मेलों और त्यौहारों में दिनभर देव नाटियों का आयोजन होता था। अब देवनाटी का वजूद ही मिटता जा रहा है। पुराने रीति-रिवाजों पर लग रहे ग्रहण से जिला कुल्लू के बुजुर्ग और बुद्धिजीवी वर्ग इस बदलते परिवेश से काफी आहत हैं। बुजुर्गों का कहना है कि देवभूमि में देवगीत लगभग खत्म हो गए हैं। देव त्यौहारों में गीत गाए भी जा रहे हैं तो महज खानापूर्ति को।
देवगीतों का खत्म होना लोग बुरी शक्तियों का आगाज मान रहे हैं। मणिकर्ण घाटी के बुजुर्ग मास्टर जीत राम और होतम राम पुजारी ने कहा कि युवा पीढ़ी ने देव समाज को पूरी तरह बदल दिया है। देवरीति में नए-नए कायदे कानून बनाए जा रहे हैं। देवी-देवताओं के मेले त्यौहारों में गाए जाने वाले गीत करीब खत्म होते दिख रहे हैं। पौराणिक देव गीतों की गूंज कम होने से क्षेत्र में प्राकृतिक आपदा खासकर सूखा पड़ना, बुरी शक्तियों का साया, फसल को नुकसान तथा बीमारियां लगना मुख्य है। अब देव गीतों को डिस्को नाटी में बदल दिया है। माता कैलाशना के गुर बेली राम ने कहा कि सचमुच देवी-देवताओं की शक्ति कम होती जा रही है और देव गीत समाप्ति पर है।
