
नैनीताल

रविवार के दुर्लभ वलयाकार (रिंग नुमा) सूर्यग्रहण से सौर वैज्ञानिकों को सूर्य से जुड़े एक आश्चर्यजनक और अनोखे रहस्य को सुलझाने का मौका मिला है। विश्व भर के सौर वैज्ञानिक अब इसके विश्लेषण में जुट गए हैं। यह संयोग है कि सूर्य पर ग्रहण लगे तभी कोरोना नजर आता है और पृथ्वी पर कोरोना नजर आए तो ग्रहण लग जाता है लेकिन रहस्य इन दोनों का ही अब तक अनसुलझा और वैज्ञानिकों के लिए चुनौती बना हुआ है।
सूर्य के वातावरण में स्थित परत कोरोना कहलाती है। यह सामान्य परिस्थितियों में आसानी से नजर नहीं आती लेकिन वलयाकार ग्रहण के समय तब बिल्कुल साफ नजर आती है जब सूर्य को चांद लगभग पूरा ढक लेता है। कोरोना सूर्य की सतह से दूर इसके वायुमंडल की बाहरी परत में है। इसके बावजूद यह सूर्य की सतह के मुकाबले सैकड़ों गुना अधिक गर्म है, जबकि यह ऊर्जा या गर्मी उसी सूर्य की सतह से पाता है।
एरीज के वैज्ञानिक एसबी पांडे के अनुसार वैज्ञानिक आज तक इस रहस्य को नहीं सुलझा पाए हैं कि ऐसा कैसे है। गर्म सतह से लाखों किमी. दूर स्थित कोरोना सूर्य की सतह से ज्यादा गर्म कैसे है। वह भी कोई मामूली रूप से नहीं बल्कि इससे सैकड़ों गुना ज्यादा गर्म। सूर्य की सतह का तापमान जहां लगभग 5500 डिग्री सेंटीग्रेट है, वहीं इससे दस लाख किमी से भी अधिक दूर स्थित कोरोना का तापमान 10 लाख डिग्री सेंटीग्रेट से भी ज्यादा होता है।
खास बात यह भी है कि कोरोना का घनत्व भी सूर्य की सतह से 10 लाख गुना कम होता है फिर भी इसमें गर्मी इतनी ज्यादा होना बहुत बड़ी पहेली है। यहां यह जानना महत्वपूर्ण है कि सूर्य की कोर (केंद्र) का तापमान डेढ़ करोड़ डिग्री सेंटीग्रेट तक होता है, जबकि सतह तक आते-आते तापमान 5500 डिग्री सेंटीग्रेट रह जाता है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी ने कोरोना के इस रहस्य को जानने को आइरिस मिशन लांच किया था।
उससे नासा ने ये नतीजा निकाला कि सूर्य की सतह से बहुत तेज गति के ऊर्जा के कण (हीट बम) निकलते हैं, जो कोरोना में जाकर फट जाते हैं। इससे कोरोना ज्यादा गर्म हो जाता है। लेकिन इसे कोरोना के अत्यधिक गर्म होने का इकलौता कारण नहीं माना गया है। बहरहाल रविवार के सूर्यग्रहण को लेकर विज्ञानी इस रहस्य को सुलझाने में महत्वपूर्ण जानकारी मिलने को लेकर बहुत उत्सुक थे, अब इसका अध्ययन किया जाना है।
