पुलिस को नहीं है यहां आने की अनुमति

कुल्लू: देवी-देवताओं की भूमि कुल्लू में जहां विश्व प्राचीनतम गांव मलाणा अपनी प्राचीन परंपरा, मान्यताओं तथा देवता के कायदे-कानूनों के लिए विश्व प्रसिद्ध है, वहीं देवभूमि कूल्लू के सैंज घाटी में स्थित शांघड़ का भी अपना विशेष महत्व है। पश्चिमी हिमालय का यह भूखंड बेहद खूबसूरत है। यह स्थान ऐतिहासिक, धार्मिक आस्था, अद्भुत परंपराओं एवं मान्यताओं के लिए मशहूर है। देवदार के हरे भरे वृक्षों से घिरे विशाल मैदान यहां की सुंदरता को चार चांद लगा देते हैं।

 

बताते हैं कि अज्ञातवास के दौरान यहां पाड़वों ने मिट्टी छानकर धान बोया था। यहां की भूमि में एक भी कंकड़ पत्थर नहीं दिखता है। मैदान के एक किनारे देवता शंगचूल महादेव मंदिर इसको भव्यता प्रदान करता है। सदियों से यहां के लोग देवता के कायदे-कानूनों को मानते आ रहे हैं। इस कारण करीब 128 बीघा भूखंड में किसी भी हथियार से खुदाई नहीं की जाती है। देवता के कायदे कानून के अनुसार अपराधी को पकडऩे के लिए इस मैदान में पुलिस को वर्दी पहनकर जाने की मनाही है और न ही यहां मारपीट कर सकते हैं। संस्कृति के लिए भी शांघड़ की अहमियत कम नहीं है। लोगों का अपने ग्राम देवता में अटूट आस्था है। गांव में शायरी और शाडऩू जैसे मेले इसकी पहचान है।

 

कड़े देव नियमों का करना पड़ता है पालन
इस धार्मिक स्थल पर नशीले पदार्थों जैसे शराब, बीड़ी व सिगरेट आदि का सेवन करना सख्त मना है। इसके अलावा कोई भी व्यक्ति कुर्सी पर नहीं बैठ सकता और सोने के लिए पलंग का प्रयोग कर सकता है। उसे जमीन पर आसन लगाकर ही बैठना पड़ता है। देव स्थान पर ऊंची आवाज में बात न करना, गाली-गलौच, सीटियां न बजाना, घुंघरू की आवाज न करना, चमड़े के जूते न लाना आदि कई कड़े देव नियमों का पालन करना पड़ता है। ऐसा न करने पर देवता द्वारा भयंकर दंड दिया जाता है।

 

पेड़-पौधों पर नहीं चलती कुल्हाड़ी
शांघड़ मैदान के हरा-भरा होने की खासियत यह है कि यहां पर देव नियमों के अनुसार किसी भी हथियार से झाड़ी या पेड़ काटने की सख्त पाबंदी है। यही कारण है कि आज भी यह मैदान हरियाली बनाए हुए है।

 

देव नियम भंग करने पर मिलता है कठोर दंड
इस धर्म स्थल पर अनजाने में देव नियम भंग करने पर देवता द्वारा कठोर दंड दिया जाता है। अगर समय रहते इस स्थान पर पश्चाताप यज्ञ नहीं करवाया जाता है तो देवता गलती करने वाले व्यक्ति तथा हरियानों व कारकूनों को भी सजा देता है। जिस स्थान पर व्यक्ति द्वारा देव नियम भंग हुआ होता है उसी स्थान पर पश्चाताप यज्ञ करवाना पड़ता है। इसमें एक किनारे देवता के मुख्य कारकून तथा दूसरी तरफ उस व्यक्ति को बिठाया जाता है जिसने देव नियमों की उल्लंघना की हो। पश्चाताप यज्ञ करवाने की प्रक्रिया में देवता का गुर ही देवता को मनाकर सुख-शांति की कामना करता है तथा देव नियम भंग करने वालों को माफ करने की प्रार्थना करता है। इस प्रक्रिया के बाद धाम का आयोजन किया जाता है।

 

पुजारी शंगचूल महादेव शांघड़ मनोज शर्मा ने बताया कि सदियों से देवलु देव नियमों का पालन करते आ रहे हैं। धार्मिक एवं पर्यटन की दृष्टि से यहां पर मूलभूत सुविधाओं के अभाव में श्रद्धालुओं और पर्यटकों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। यहां शौचालय, कूड़ेदान और पेयजल की व्यवस्था का होना बेहद जरूरी है।

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