रात दो बजे ही खुल गए मंदिर के कपाट

चिंतपूर्णी (ऊना)। श्रावण अष्टमी मेले को लेकर मंदिर के कपाट रविवार रात दो बजे ही खोलने का निर्णय लिया गया है। श्रद्धालुओं ने कतारबद्ध होकर दर्शन किए और आरती में भी हिस्सा लिया। शनिवार शाम को ही श्रद्धालु चिंतपूर्णी पहुंच गए थे। कई पैदल ही मां के दरबार की ओर बढ़ते रहे तो कई वाहनों में पहुंच रहे थे।
कई श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर लेटकर, कई घुटनों के बल आगे बढ़ रहे थे तो कई मन्नत पूरी करने की इच्छा से पहुंच रहे थे। समूहों में लोग झंडा लेकर भी चिंतपूर्णी पहुंचे। मां के जयकारों से चिंतपूर्णी गुंजायमान रहा। गगरेट से लेकर चिंतपूर्णी तक कई संस्थाओं की ओर से लंगरों की व्यवस्था की गई थी। मेले को लेकर सजे चिंतपूर्णी के बाजार में रौनक बढ़ गई है। स्थानीय कारोबारी भी खूब चांदी कूट रहे हैं। कई लोग हाथ में दीये लेकर आगे बढ़ रहे थे। मां चिंतपूर्णी के प्रति इतनी गहरी आस्था और विश्वास के दर्जनों प्रत्यक्ष उदाहरण ऐसे मिले, जिन्हें हर कोई निहारता ही रह गया। पंजाब के जालंधर से लेकर चिंतपूर्णी तक नंगे पांव पहुंचे करीब 60 लोगों के समूह में अवतार सिंह, सूरज, अविनाश, कपिल, सुनील सिंह, कमलजीत सिंह, सिमरन, पल्लवी, रिधिमा, चंचल, नीलम आदि ने कहा कि वे श्रावण अष्टमी के मेले के लिए हर साल इसी तरह यहां पहुंचते हैं। इन भक्तों ने कहा कि मां से जो मांगा, वह मिल जाता है। कई बड़े-बड़े असंभव से लगने वाले कार्य भी मां की कृ पा से पूरे हो गए। इसीलिए हर बार मां के दर्शन करना नहीं भूलते।

हर लकीर कम करती गई फासला
कई भक्त मां के दरबार की ओर लेटकर आगे बढ़ रहे हैं। इनकी मन्नत भी ऐसी थी, जिसका पूरा होना किसी चमत्कार से कम नहीं। मंदिर की ओर लेटकर आगे बढ़ती चंडीगढ़ की ऋ तु के साथ उसकी ननद अंजली भी चल रही थी। हाथ जोड़कर सड़क पर लेटते हुए आगे बढ़ती ऋतु के हाथ जहां तक पहुंचते थे, वहां अंजली एक लकीर खींच रही थी। उसी लकीर से उतनी ही आगे सरकते हुए ऋतु आगे बढे़ जा रही थी। यह लकीर ही ऋतु और मां के दरबार के बीच फासले को कम करती जा रही थी। पूछने पर अंजली ने बताया कि ऋतु सड़क हादसे का शिकार हुई थी। चलना फिरना भी बंद हो गया था। जैसे पूरे शरीर को लकवा मार गया। मां से मन्नत मांगी और ऋतु धीरे धीरे ठीक हो गई। अब ऋतु खुद चल फिर सकती है। बस इसी कारण ऋतु मां के दरबार की ओर इस तरह बढ़ रही है।

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