महज प्रतियोगिता का केंद्र बना पशु मेला

घुमारवीं (बिलासपुर)। जमाने की रफ्तार के साथ मेले-त्यौहारों के मायने भी बदलने लगे हैं। बिलासपुर जिले में होने वाले नलवाड़ मेलों को ही लें तो कभी पशुओं की खरीद-फरोख्त के लिए होने वाले यह मेले अब महज उत्सव एवं मनोरंजन का साधन बनकर रह गए हैं। पशुओं की बिक्री की जगह आधुनिक युग के साजो सामान ने ले ली है। मनोरंजन के लिए सांस्कृतिक संध्याओं का सहारा लिया जा रहा है।
बिलासपुर में मार्च और अप्रैल महीनों में नलवाड़ मेलों की धूम रहती है। बिलासपुर को नलवाड़ी मेला कभी पशुओं की खरीद-फरोख्त के लिए मशहूर था। यहां भारी संख्या में पशुओं की बिक्री होती थी। अब पशु पालन से एक तरह से लोगों ने मुंह मोड़ लिया है। जिस वजह से अब यहां कारोबार के लिए कोई पशु व्यापारी नहीं पहुंचते। सुन्हाणी और घुमारवीं के मेलों में भी ऐसा है। पशुपालन विभाग द्वारा पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए प्रतियोगिता करवाई जा रही है। हर साल होने वाली इस प्रतियोगिता में बेहतर किस्मों के पशुओं को पालने वाले किसानों को बेहतर ईनाम देकर सम्मानित किया जाता है। पिछले कुछ सालों से प्रतियोगिता में आने वाले पशुपालकों की संख्या में भी कमी दर्ज की जा रही है।
बुजुर्ग अशोक कुमार कहते हैं कि अब पशुपालन करने वाले किसान ही कम रह गए हैं। लिहाजा, पशुओं का कारोबार भी प्रभावित हो गया है। पशुओं की खरीदारी ही नहीं हो रही। लिहाजा, यह कारोबार भी बंद सा हो गया है। 80 वर्षीय राम नाथ ने बताया कि 15-20 साल पहले नलवाड़ी मेले में पशुओं की खूब खरीदारी होती थी। अब ऐसा नहीं हो रहा। उधर, एडीएम प्रदीप कुमार ठाकुर ने बताया कि पशु पालन को बढ़ावा देने के मकसद से मेले में इस तरह की प्रतियोगिता करवाई जाती है। खरीदारी और बिक्री नहीं हो पाती।

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