
दिल्ली हाईकोर्ट ने महिलाओं संबंधी फैसलों में अदालतों को लिंग भेदी और संवदेनहीन टिप्पणी नहीं करनी की नसीहत दी है।
दुष्कर्म के एक मुकदमे में जिला अदालत की दो टिप्पणियों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने यह प्रतिक्रिया दी है।
जस्टिस प्रदीप नंदराजोग और जस्टिस वीके राव की खंडपीठ ने विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट के निर्णय पर खुद से संज्ञान लेते हुए कहा कि दोनों टिप्पणियां पहली नजर में संवेदनहीन हैं।
पीड़िता के विषय में की गई यह टिप्पणियां साक्ष्यों पर आधारित नहीं हैं। जिला अदालत ने अपने निर्णय में कहा था कि 19 से 24 वर्ष की लड़कियां रजामंदी से अपने प्रेमी के साथ भागती हैं।
इस पर खंडपीठ ने कहा कि यह टिप्पणी किसी सत्य आंकड़ों पर आधारित नहीं है। इससे भारतीय समाज में महिलाओं की विडंबना का पता चलता है।
महिलाएं अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने और पितृत्ववादी समाज में फंसकर रह गई हैं। ऐसे हालात में उनके साथ सहानुभूति से पेश आना चाहिए।
खंडपीठ ने जिला अदालत की दूसरी टिप्पणी पर कहा कि किसी लड़की को समाज में किस तरह का व्यवहार करना चाहिए, यह उसका उपदेश है।
हर लड़की को समाज में अपनी जिंदगी चुनने का हक है और इसमें अगर उसे चोट पहुंचती है तो कोई अदालत यह नहीं कह सकती कि उसने अपनी इच्छा की जिंदगी चुनी इसलिए उसकी चीख को न सुना जाए।
जिला न्यायाधीश की टिप्पणी को कार्रवाई के लिए रिकार्ड पर लेते हुए कहा कि लिंग भेदी फैसलों को पुलिस और अभियोजन ऐसे मामलों की जांच तथा अभियोग के लिए मानक के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं।
विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट ने अक्तूबर में आए अपने एक फैसले में पीड़िता के संबंध में यह टिप्पणी की थी। पीड़िता का आरोप था कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर उससे शारीरिक संबंध बनाए।
