
कुल्लू। अंतरराष्ट्रीय दशहरा में पहुंचे 222 देवी देवताओं के साथ आए हजारों देवलू और कारकून उत्सव के समापन तक तपस्वियों की तरह रहेंगे। वे सात दिन देवता के साथ अस्थायी टेंटों में रहेंगे और जमीन पर ही सोएंगे। इस दौरान वे भोजन भी खुद की पकाएंगे और अपने घरों में भी नहीं जाते हैं। वे पारंपरिक तरीके से रोजाना सुबह-शाम देवता की पूजा करेंगे और दूर-दूर से आए भक्तों की समस्याओं का निवारण भी करते हैं। यही नहीं देवलू रात दिन देवता के पहरे में भी तैनात रहते हैं। दशहरा उत्सव में आए प्रत्येक देवी-देवता के साथ करीब सौ से डेढ़ देवलू होते हैं।
देवता के अस्थायी शिविरों में हर रोज सैकड़ों देवलुओं के लिए सुबह शाम भोजन बनता है। खाने में सुबह के समय दाल चावल और रात के समय रोटी की व्यवस्था होती है। कुछ देवी-देवताओं के अस्थायी शिविरों में मांस-भात की धाम भी पकती है जबकि कुछ देवी-देवताओं के देवलू दशहरे के दौरान केवल सात्विक भोजन करते हैं। दशहरा उत्सव में कई देवता करीब 200 किलोमीटर का पैदल सफर करके पहुंचे हैं। इस दौरान कुछ देवलू करीब एक माह तक घर से बाहर रहेंगे। आनी के देवता खुड़ीजल के कारदार एसएस दीपक, मारकंडेय ऋषि, बलागाड़ शिकारी बंजार के कारदार चेतन स्वरूप, धूमल नाग हलाण-2 के पुजारी रोशन लाल, देवता चम्बू फाटी कशोली निरंमड के हरदयाल, शिवराम, देवता लक्ष्मी नारायण तिंदर बंजार के कारदार नरोत्तम सिंह ने बताया कि देवता के अस्थायी शिविरों के आसपास दिन-रात देवलू स्वयं भी पहरा देते हैं। हर समय पांच से दस लोग देवता के अस्थायी शिविरों के आसपास मुस्तैद रहते हैं।
