
रानीखेत। श्राद्ध पक्ष में पितरों को याद करने के लिए कभी यहां बैठकी रामलीला होती थी। यह जानकर आश्चर्य होगा, लेकिन यह सच है। बाजार क्षेत्र में कई रंगकर्मियों के यहां रात्रि में कीर्तन भजन होते थे। अश्विन माह में श्राद्ध पक्ष के दौरान बैठकी रामलीला (बूढ़ों की रामलीला) होती थी। बुजुर्ग रंगकर्मी शास्त्रीय संगीत के आधार पर रामलीला की चौपाइयां गाते थेे।
बैठकी रामलीला स्व. उदय लाल साह, गणेश लाल साह, बसंत लाल वर्मा और किशोरी लाल साह के निर्देशन में होती थी। वरिष्ठ रंगकर्मी कैलाश पांडेय और भुवन चंद्र पपने बताते हैं कि सप्ताह में प्रत्येक दिन बारी-बारी से उदय लाल साह, गणेश लाल साह, नवीन बुदलाकोटी, गिरीश वर्मा, किशोरी लाल वर्मा, किशोरी लाल साह, महेंद्र प्रताप सिंह, हेमंत जोशी, नारायण दत्त पंत, मोहन चंद्र, भोलादत्त कांडपाल आदि के यहां भजन-कीर्तन होते थे। किसी किसी दिन सुंदरकांड भी होता था। श्राद्ध पक्ष में रामलीला बगैर वेश भूषा के होती थी, लेकिन शास्त्रीय संगीत के आधार पर चौपाइयां गाई जाती थीं। अल्मोड़ा निवासी रंगकर्मी बसंत लाल वर्मा यहां डिग्री कालेज में कार्यरत थे, उनके साथ लक्ष्मी लाल वर्मा की जुगलबंदी देखने लायक होती थी। बुजुर्गों की सहभागिता होने के कारण इसे बूढ़ों की रामलीला भी नाम दिया गया था। इससे युवाओं को सीखने का मौका मिलता था। इनमें से वर्तमान में अधिकतर बुजुर्ग अब इस दुनिया में नहीं रहे। रंगकर्मी उदय लाल साह के निधन के बाद यह प्रथा बंद हो गई।
