साहब! अब जंगल से कहां जाएं…

कर्णप्रयाग। साहब! जहां मकान हैं वहां भू-धंसाव हो रहा है। टूट चुके भवनों को हम डेढ़ माह पूर्व छोड़ चुके हैं। तब से जंगलों में टेंट और छप्पर बना कर रह रहे हैं। अब गांव वाले ही जंगल में रहने का विरोध कर रहे है।। ऐसे में हम अब कहां जाएं। यह बातें जैंटी की प्रभावित सुलोचना देवी ने तहसीलदार से कही।
जुलाई में आई बाढ़ से जैंटी मल्ली गांव में कई परिवार बेघर हुए, जिनमें यहां रहे रहे अनुसूचित जाति के सात परिवार भी शामिल हैं। 50 दिन से गांव से दूर भटकोटी के जंगलों में छप्पर बनाकर रह रहे हैं। ग्रामीण राकेश लाल, सौणिया लाल, शिव लाल ने बताया कि गांव के लोगों के अनुसार उनका यहां पनघट और गौचर सहित अन्य काश्तकारी की जाती है। ऐसे में उन्हें जंगल खाली करना पड़ेगा। राजेंद्र लाल ने बताया कि अब यहां से कहां जाएं, यह समझ में नहीं आ रहा है।

प्रभावित बोले
24 जुलाई को मेरा मकान भू-धंसाव के चलते दरक गया। गौशाला और खेत बह गए। बिना सहायता के हम जंगल में रह रहे हैं। अब अन्य ग्रामीण यहां रहने का विरोध कर रहे हैं, तो यहां से कहां जाएं।
-सुलोचना

गांव के लोगों के अनुसार जंगल उनका नहीं है। इसलिए यहां से खाली करना पड़ेगा, लेकिन टूटे घरों में रहने में डर लग रहा है। प्रशासन हमें कहीं रहने की अनुमति दे, तो हम वहीं जिंदगी दोबारा शुरू करेंगे।
-बुद्धि लाल

हम सात परिवार आपदा के डर से जंगल में छप्परों में रहे हैं। प्रशासन ने अभी किसी प्रकार की कोई आर्थिक मदद नहीं दी है। अब बच्चों और मवेशियों को लेकर कहां जाएं।
-शुक्रु लाल।

संबंधित राजस्व उपनिरीक्षक और निरीक्षकों के साथ उच्चाधिकारियों से राय मशविरा कर मामले की जांच कराई जाएगी। अन्याय किसी के साथ भी नहीं होगा।
-प्रकाश शाह, तहसीलदार कर्णप्रयाग।

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