ऐतिहासिक बग्वाल की परंपरा कुछ तो बदली

देवीधुरा (चंपावत)। मां बाराही देवी को प्रसन्न को करने के लिए हर साल होने वाली ऐतिहासिक बग्वाल में वर्षों पुरानी परंपरा कुछ बदलती दिखी। पूर्व घोषणा के मुताबिक पत्थरों से होने वाला युद्घ इस बार फलों से शुरू तो हुआ लेकिन कुछ ही देर बाद पत्थर फेंकने के साथ जमकर लाठियां भी फेंकी गईं। जिसमें दस दर्शकों समेत करीब 70 लोग चोटिल हुए हैं। बाराहीधाम के ऐतिहासिक खोलीखांड दूबाचौड़ मैदान में बुधवार को बग्वाल के हजारों लोग साक्षी बने।
बग्वाल अपराह्न 2.13 बजे से शुरू हुई और13 मिनट तक चली। जबकि पिछले साल यह 26 मिनट तक चली थी। दिन में एक बजे पश्चिमी छोर से खाम प्रमुख बद्री सिंह बिष्ट के नेतृत्व में वालिक खाम ने प्रवेश किया। उसके बाद पूर्वी छोर से गंगा सिंह चम्याल के नेतृत्व में चम्याल खाम आई। इसके बाद पूर्वी छोर से ही गहड़वाल खाम ने प्रवेश किया। जिसका नेतृत्व वयोवृद्ध त्रिलोक सिंह बिष्ट कर रहे थे। सबसे अंत में इसी छोर से खाम प्रमुख वीरेंद्र लमगड़िया के नेतृत्व में लमगड़िया खाम के रणबांकुरों ने बग्वाल मैदान में प्रवेश करने के बाद मंदिर की परिक्रमा की।
शंखनाद के साथ बग्वाल की शुरुआत हुई। सबसे पहले वालिक खाम की ओर से गोल मेल (नाशपाती) चम्याल तथा गहड़वाल खाम की ओर उछला। इसी के साथ कुछ देर तक फलों से बग्वाल होती रही। नाशपाती जब पूरी तरह से तहस-नहस हो गई तो लोगों ने पत्थर उठा लिए। इस दौरान बड़े पत्थर भी मारे गए। कुछ लोग पत्थरों के स्थान पर लठ भी फेंक रहे थे। पत्थर की शुरुआत पूर्वी छोर से हुई। इस दौरान वालिक तथा लमगड़िया खाम के लोग अधिक चोटिल हो गए। बग्वाल के समाप्त होने के पांच मिनट बाद तक भी पत्थरों की एक दूसरे पर मार होती रही। मंदिर के पुजारी धर्मानंद पीत वस्त्र धारण कर जब रण क्षेत्र में आए तब बग्वाल समाप्त हुई। बग्वाल समाप्त होने के बाद सभी खामों के लोग आपस में एक दूसरे के गले मिले। इससे पूर्व यहां तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई थी। पुलिस ने पुख्ता इंतजाम किया था।

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