अब बिना चीर-फाड़ घेंघा का इलाज

चंडीगढ़: पी.जी.आई. ने गॉएटर बीमारी का तोड़ निकाल लिया है। आयोडीन की कमी के चलते गर्दन में बनने वाले सिस्ट को अब चीड़-फाड़ के बगैर की हटाया जा सकता है।

रेडियोडायगनोसिस विभाग के डॉक्टर्स की रिसर्च ने दवाओं का ऐसा फार्मूला तैयार किया है जो छह सप्ताह में गॉएटर के छह सैंटीमीटर बड़े आकार को तीन सैंटीमीटर तक कर देती है।

सैट्रोल थैरेपी को अब तक वेरीकोस वीन्स के इलाज में इस्तेमाल किया जाता था परंतु अब गॉएटर के इलाज में भी यह थैरेपी रामबाण साबित हुई है। गर्दन के सिस्ट में सैट्रोल (सोडियम टैटराडाइसील सल्फेट) और एथनोल (शराब)को इंजैक्ट किया गया। आधे रोगियों में सैट्रोल इंजैक्शन के सैशन दिए गए, जबकि बाकी रोगियों के सिस्ट में एथनोल डाली गई।

सैट्रोल इंजैक्शन वाले रोगियों की तरह एथनोल इंजैक्शन वाले रोगियों के सिस्ट का आकार भी घटा परंतु एथनोल इंजैक्शन से रोगियों के शरीर पर अन्य कई दुष्प्रभाव भी देखे गए।

सैट्रोल इंजैक्शन को गॉएटर के खात्में में सर्वश्रेष्ठ पाया गया। पहले गॉएटर रोगियों की गर्दन से सिस्ट को हटाने के लिए चीड़-फाड़ किया जाता था। रोगी के थाइरायड गलैंड को काट दिया जाता था।

यह है गॉएटर

थाइरॉयड गलैंड की सोजिश की वजह से गर्दन में आने वाली सोजिश से पांच से छह सैंटीमीटर तक बड़ा सिस्ट बन जाता है। शरीर में आयोडीन की कमी थाइरॉयड गलैंड को अपना काम नहीं करने देती। गॉएटर का आकार हर रोगी में अलग होता है। कुछ रोगियों में गॉएटर आयोडीन की कमी के कारण नहीं बल्कि गलैंड के अंदर सैल्स के पाथवे में खराबी भी यह बीमारी दे देती है।

ऐसे निकाला डॉक्टर्स ने तोड़

गॉएटर के इलाज को पी.जी.आई. आए रोगियों की गर्दन में बने सिस्ट को चीड़-फाड़ के बगैर हटाने के लिए आप्रेशन थिएटर के अंदर सिस्ट में दवा इंजैक्ट की गई। गर्दन के इस सिस्ट में दवा इंजैक्ट करना आसान नहीं है।

अल्ट्रासाऊंड गाइडैंस में दवा को गर्दन के सिस्ट में इंजैक्ट किया गया। सिस्ट के आकार के हिसाब से कुछ सैशन में यह दवा इंजैक्ट की गई। दवा की वजह से रोगियों के सिस्ट का आकार पचास फीसदी तक घट गया और उन्हें सांस लेने में आने वाली दिक्कत भी दूर हो गई।

50 रोगियों को किया शामिल

पी.जी.आई. में तीन साल चले इस रिसर्च में 50 गॉएटर रोगियों को शामिल किया गया। अधिकतर रोगी हिमाचल प्रदेश से संबंधित थे। ज्यादातर रोगी मध्यम आयु वर्ग के थे जबकि कुछ युवा भी थे। गॉएटर की वजह से रोगियों को खाने-पीने और सांस लेने में दिक्कत होती थी।

साल भर में आते हैं 100 रोगी

साल भर में गॉएटर के इलाज को पी.जी.आई. में करीब 100 रोगी आते हैं। गॉएटर का शिकार पुरुषों की तुलना में महिलाएं अधिकाधिक होती हैं। इनकी उम्र 30 से 40 आयु के बीच थी।

रिसर्च टीम

रेडियोडायग्नोसिस विभाग से प्रो. एन.के. खंडेलवाल, प्रो.नवीन कालरा, डा.चिराग, एंडोक्राइनोलॉजी विभाग से प्रो. अनिल भंसाली, डॉ.पिनाकी दत्ता, साइटोलॉजी विभाग से प्रो.ए.राजवंशी, न्यूक्लीयर मैडीसिन विभाग से डा.बी.आर.मित्तल।

गॉएटर से बचने के लिए

.आयोडीन युक्त नमक का सेवन।
.गर्दन में छोटा सा भी मांस इक_ा होने लगे तो थाइरॉयड टैस्ट कराएं।
.संदेह होने पर गर्दन का अल्ट्रासाऊंड करवाएं।
.लगातार थकावट और कमजोरी महसूस होने पर थाइरॉयड टैस्ट कराएं। .ज्यादा पसीना आने वाले व्यक्ति को भी थाइरॉयड टैस्ट करवाना चाहिए।

सैट्रोल थैरेपी ने निकाला तोड़

पी.जी.आई के रेडियोडायग्नोसिस प्रो.नवीन कालरा का कहना है कि अब चीड़-फाड़ के बगैर गॉएटर में बने सिस्ट का सफाया किया जा सकता है। सैट्रोल थैरेपी से गर्दन के गैंगेपन को आसानी से दूर किया जा सकता है। पहले यह थैरेपी वेरीकोस वीन्स के इलाज में इस्तेमाल होती थी। अब गैंगेपन का भी इससे तोड़ निकल आया है परंतु सैट्रोल इंजैक्शन अल्ट्रासाऊंड गाइडैंस में ही करना जरूरी होता है अन्यथा शरीर की दूसरी नसों में समस्या उत्पन्न होने का खतरा है।

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