
कर्णप्रयाग। उत्साह में कमी जरूर आई है, लेकिन परंपराओं का निर्वहन भी जरूरी है। राजजात का दिनपट्टा निगल गया है। ऐसे में नंदा को ससुराल विदा करना ही होगा। हमें केदारनाथ आपदा का बहुत दु:ख है। उस दर्द की भरपाई नहीं की जा सकती है, लेकिन इस कार्य को भी पूरा करना भी जरूरी है।
ये शब्द नंदा राजजात के पहले पड़ाव ईड़ा-बधाणी के ग्रामीणों के हैं। गांव में कुछ नए घरों का भी निर्माण हो रहा है। कलम सिंह गुसाईं कहते हैं कि बिगड़ते मौसम से डर भी बना है, लेकिन राजजात की मनौती की जा चुकी है। दिनपट्टा निकल चुका है। ऐसे में अब राजजात होनी चाहिए। भरत सिंह नेगी कहते हैं कि गांव में मुख्य रास्ते पर काम तो हो रहा है, लेकिन 29 अगस्त यह हो पाएगा कहना मुश्किल है। यात्रा सकुशल संपन्न होने के लिए व्यापक स्तर पर काम होने जरूरी है।
गांव में मां नंदा के मुख्य मंदिर का सुंदरीकरण किया जा रहा है, जबकि मुख्य रास्ते पर भी तीन स्थानों पर काम चल रहा है। केदारनाथ आपदा से पहले तक लोगों में राजजात को लेकर खासा उत्साह था, लेकिन अब सिर्फ परंपराओं के निर्वहन की बातें हो रही है। पूर्व नगर पंचायत सभासद बलवंत सिंह गुर्साइं का कहना है कि हम अपनी आराध्य नंदा का धार्मिक अनुष्ठान के साथ स्वागत करते हुए उसे ससुराल विदा करेंगे।
