और अंधेरे में खो गई उजाले की उम्मीद

काईस (कुल्लू)। अभी तक अंधेरे में जिंदगी गुजार रहे कुल्लू जिले के तीन गांवों के लोगों को जल्द राहत मिलती नजर नहीं आ रही। हैरत इस बात की है कि आजादी के बाद कितनी सरकारें आईं और गईं लेकिन इन गांवों तक बिजली नहीं पहुंची। अंधेरे में गुजर बसर करते आ रहे ग्रामीणों को अब उजाले की उम्मीद जगी थी लेकिन अब भी अंधेरे में खो गई।
नेशनल पार्क और और उसमें रहने वाले जीव जंतुओं की हिफाजत गांवों को रोशनी में रोड़ा बन गए हैं। सैंज घाटी के शुगार, शाक्टी और मरोड गांवों में 21वीं सदी में बल्ब नहीं जलते। यह तीनों गांव उसी कुल्लू जिले में है जहां एक दर्जन छोटी-बड़ी विद्युत परियोजनाएं लंबे समय से चल रही हैं। राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना के तहत इलाके के लिए बिजली पहुंचाने को मंजूरी मिल चुकी है लेकिन वन सेंक्चुरी और नेशनल पार्क के कड़े नियम रोड़ा बन गए हैं। तीनों गांवों के करीब 40 से अधिक घरों को रोशन करने के लिए नेशनल पार्क क्षेत्र से विद्युत लाइनें जा रही हैं। लेकिन लाइन के लिए पोल गाड़ने की अनुमति पार्क प्रबंधन से अभी नहीं मिली है। परिणामस्वरूप लाइन बिछाने का कार्य लटक गया। तीनों गांव सड़क से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ग्रामीण महेंद्र सिंह, हीरा लाल, शेर सिंह और डोला राम ने कहा कि वर्षों से वह बिजली पहुंचने का सपना देख रहे हैं। अब उम्मीद थी लेकिन फिर धुंधली पड़ गई है।
विद्युत बोर्ड लारजी में तैनात सहायक अभियंता श्याम लाल बौद्ध ने कहा कि नेशनल पार्क प्रबंधन के लाइन बिछाने की अनुमति न देने से कार्य लटका पड़ा है। ग्रामीणों को हर घर में विद्युत बोर्ड ने करीब 40 सोलर लाइटें प्रदान की हैं। अनुमति मिलने के बाद बिजली पहुंचाने का कार्य युद्ध स्तर पर शुरू होगा। वन्य प्राणी विभाग के अरण्यपाल अजय श्रीवास्तव ने बताया कि बिजली बोर्ड ने एनओसी के लिए फाइल सौंपी है। इसेे केंद्रीय वन मंत्रालय को अनुमति के लिए भेजा है। अनुमति के बाद ही लाइन बिछा सकते हैं।

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