
बागेश्वर। केदारनाथ की तबाही के बाद पर्वतीय क्षेत्र में विकास नीति को लेकर तमाम तरह के सुझाव आ रहे हैं। रामजस कालेज दिल्ली के एसोसिएट प्रोफेसर और लेखक डा. मोहन चंद्र तिवारी ने तबाही के लिए अनियंत्रित दोहन को जिम्मेदार माना है। उन्होंने 2009 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा तैयार पर्यावरण आचार संहिता को लागू करने की मांग की है।
मूल रूप से द्वाराहाट के जोयों गांव निवासी डा. मोहन चंद्र तिवारी ने अयोध्या के राममंदिर सहित तमाम धार्मिक, पुरातात्विक धरोहरों और मान्यताओं पर पुस्तकें और लेख लिखे हैं। उनका मानना है कि केदारनाथ में आधुनिक समय के सभी निर्माण पानी के उफान में बह गए। लेकिन केदार नाथ भगवान का मंदिर सुरक्षित रहा। यह सब उसकी समृद्ध वास्तु शिल्प और मजबूत बुनियाद का फल है। उत्तराखंड में प्राचीन समय के निर्माण प्रकृति के साथ संतुुुलन कायम करके खड़े किए गए। प्राकृतिक गतिविधियों को रोका नही जा सकता। लेकिन आपदाआें से जानमाल की रक्षा हो सकती है। इस पहलू को अब नजरअंदाज किया जा रहा है। संवेदनशील स्थलों पर भवनों का भार बढ़ाया जा रहा है। नदियों को सुरंगों में कैद किया जा रहा है। पहाडों पर सड़क बनाने को बारूद से विस्फोट किया जा रहा है। विकास के नाम पर यहां की सभी सरकारें संसाधनों को लुटाती रही हैं। गढ़वाल में भवन गिरने की अधिकतर घटनाएं ऐसी ही अनदेखी का नतीजा हैं। डा. तिवारी ने कहा है कि केंद्र के पर्यावरण मंत्रालय ने इस तरह के खतरों को भांपते हुए 2009 में, गवर्नेंस फार सस्टेनिंग हिमालय ईको सिस्टम गाइड लाइंस नाम से पयावरण संबंधी आचार संहिता का प्रारूप बनाया है। इसे लागू करके हिमालयी राज्यों में निर्माण और दोहन की मनमानी को रोका जा सकेगा।
