
करीब दोपहर 12 बजे के आस-पास हम हर्षिल पहुंचते हैं सेब के सुंदर बगीचों और प्राकृतिक नजारों के लिये चर्चित हर्षिल-धराली में विरानी पसरी है। महाविनाश से हर कोई सहमा हुआ है और बर्बादी के दृश्य चारों ओर बिखरे पड़े हैं। कभी जो हर्षिल घाटी सैलानियों से गुलजार रहती थी वहां खौफ पसरा हुआ है। भयावह नजारे तो उन गांवों में हैं जहां हर्षिल से पहुंचने के लिये पांच-दस किलोमीटर का और सफर तय करना है।
हर्षिल हैलीपैड के राहत शिविर में लगभग तीन सौ लोग नजर आते हैं। हर कोई जैसे तैसे उत्तरकाशी तक पहुंचना चाहता है। जरिया यही है कि या तो सेना के हैलीकाप्टर उन्हें ले जाये या फिर करीब 70 किमी सड़क व जंगली पगडंडियों का लांघ कर पार किया जाये। हर्षिल में आस-पास के इलाकों की तबाही के बारे में लोग बताते ही हैँ। हम वहां की घटना को अपनी आंखों से देखने के लिये धराली की और बढते हैं।
हर्षिल से कुछ कदम आगे बढते हैं अचानक सेब के बगीचों पर नजर जाती है, इन बगीचों पर जालंधरी नदी के उफान से आई रेत बिखरी है। कुछ आगे चलने पर खौफनाक गदेरे की आवाज में तरह-तरह के पक्षियों की चहचाहट भी न जाने कहां गई। जगह-जगह पहाड़ छलनी हैं। आखिर हम धराली में पहुंच ही गये, यह सीमांत गांव है, इस छोर में देश का आखरी गांव। देखते ही लोग आपबीती सुनाने लगते हैं, कोई नहीं आया अब तक, देखो बाढ़ ने कैसी तबाही मचाई है। उफनती खीर गंगा ने घरों को तोड़ दिया,बाजार को खत्म कर दिया, अब क्या बचा हमारे पास, किससे अपनी बात कहें कोई चल कर भी नहीं आया।हम देखते हैं कि खीर गंगा का प्रवाह पथ दस फीट तक मलबे से पटा पड़ा है। गांव के जयभगवान पंवार कहते हैं कि दो सौ साल पुराना है हमारा गांव और इतना ही पुराना है हमारा कल्पकेदार मंदिर। कभी यहां ऐसे ढाई सौ मंदिर थे। कुछ का कहना है कि पांडवों ने बनाया, कुछ कहते हैं शंकराचार्य ने। पिछली समय-समय पर आई त्रासदियों में मंदिरों दब गये। किसी तरह तीन मंदिर बचे थे उनमें भी दो मंदिर पिछली बाढ में पानी में समा गये। अब यही कल्पकेदार का शेष हिस्सा आस्था का प्रतीक था, लेकिन उसमें भी 15 फुट रेत से भरी है।
लोग नाराज हैं, कोई उन तक नहीं पहुंचता इस मुसीबत में वह अकेले हैं। उन्हें अपनी तबाही का ही पता है वह हमसे पूछते हैं कि कहां क्या हुआ है। इस गांव के लोग एक ही जगह इकट्ठा हो जाते हैं। उन्हें चिंता इस बात की भी कि आगे घर कैसे चलेगा, कब तक बनेगी गंगोत्री की सड़क, कब तक चलेगा घर का बचा राशन।
जो घटा उसने दुख दिया ही वह तो एक और अनहोनी की आंशका से डरे हुए हैं। गांव के दुर्गेश पंवार ऊंचे बुग्यालों की तरफ इशारा करता है, ऊपर देख रहे हैं आप वह श्रीकंठ पर्वत है उसके बुग्यालों से पानी रिसता जा रहा है। बकरी चराने वालों ने और ट्रैकिंग पर जाने वालों ने उन्हें बताया है कि दरार पड़ रही है, अगर कभी यह हिस्सा टूटा तो हम आपबीती बताने लायक भी नहीं रह जायेंगे। यह डर उन्हें सोने नहीं देता है।
उनमें कोई बताता है वो 16 जून की काली रात को कुछ धमाका हुआ। तेज बारिश और देवदार के वृक्षों के नदी में बहने से कुछ आशंका हो ही रही थी, पानी ने भी रंग बदल दिया था। वहीं रंग जिसको देख गांव के लोग कभी-कभी डर जाते हैं। एकाएक शोर में सब बाहर निकले तो खीर गंगा पेड़ों व मलबे के साथ तबाही मचा चुकी थी।
