
चंपावत। उत्तराखंड का अधिकांश भाग भूकंप के नजरिए से संवेदनशील जोन में है, लेकिन इसके बावजूद भवनों के निर्माण में बचाव को ठोस कवायद नहीं हो रही है, जबकि भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं को कम करने के लिए आवासीय भवनों और इमारतों के निर्माण में भूकंपरोधी तकनीक का प्रयोग खासा मददगार साबित हो सकता है। चंपावत जिले में भी निजी भवनों के अलावा ज्यादातर सरकारी इमारतों में भी भूकंप से बचाव के उपाय नाकाफी हैं। यानि भूकंपरोधी तकनीक का उपयोग केवल कागजों की शोभा हैं। भवन निर्माण से पूर्व मृदा परीक्षण की भी बस रस्म अदायगी की जा रही है।
पर्वतीय अंचलों में इक्का-दुक्का भवनों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश भवनों में भूकंप से बचाव का कोई इंतजाम नहीं है। भूकंपरोधी तकनीक की अनदेखी गांवों में ही नहीं शहरों में भी आम है। ग्रामीणों का कहना है कि भूकंपरोधी तकनीक से भवन निर्माण की उनको किसी प्रकार की व्यावहारिक जानकारी नहीं है, जबकि कुछ लोगों का कहना है कि मकान बनाना वैसे ही खासा खर्चीला काम है। उस पर भूकंपरोधी तकनीक अपनाई जाए तो मकान की लागत में 20 से 25 फीसदी तक इजाफा हो सकता है। ऐसे में अधिकांश भवन स्वामी तकनीक नहीं अपनाते हैं।
पर्यावरणविद् देवेंद्र ओली का कहना है कि राज्य के ज्यादातर हिस्से भूकंपीय खतरे के लिए संवेदनशील है। 2007 में जारी एक शासनादेश के बाद भले ही सभी सरकारी निर्माण कार्य में भूकंपरोधी तकनीक का इस्तेमाल अनिवार्य कर दिया गया हो, लेकिन इससे पूर्व में बने अधिकांश सरकारी इमारतों में भी भूकंपरोधी तकनीक का उपयोग नहीं किया गया है। जो कभी भी खतरे का सबब बन सकती हैं।
