शक्तियां छीनने पर बिफरे निकायों के प्रधान

मंडी। प्रदेश शहरी निकायों के निर्वाचित अध्यक्ष और उपाध्यक्ष वित्तीय शक्तियां छीनने पर सरकार से खफा हैं। इस मसले पर इन्होंने शहरी विकास मंत्री सुधीर शर्मा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। वित्तीय शक्तियों को लेकर शहरी विकास विभाग की ओर से नगर परिषदों एवं नगर पंचायतों के अध्यक्षों एवं उपाध्यक्षों को वित्तीय शक्तियों से वंचित किया गया। नगर परिषद एवं नगर पंचायत के अध्यक्षों को पूर्व भाजपा सरकार ने 20 अप्रैल 2002 को वित्तीय शक्तियां प्रदान की थीं, जिसके तहत नगर परिषद में होने वाले विकास कार्यों एवं वित्तीय लेन-देन पर नगर परिषद एवं नगर पंचायत के कार्यकारी अधिकारी के साथ अध्यक्ष के हस्ताक्षर भी चेक पर करने के आदेश दिए थे। 2002 से लेकर जनवरी 2013 तक नगर परिषद के अध्यक्ष वित्तीय लेनदेन में पूर्ण भागीदारी निभाते रहे हैं, मगर फरवरी में शहरी विकास निदेशालय शिमला के निदेशक कार्यालय से जो अधिसूचना जारी हुई है, उसके तहत नगर परिषद और नगर पंचायत के अध्यक्षों की वित्तीय शक्तियां छीन ली गई हैं। इस अधिसूचना से भड़के प्रदेश के 49 नगर परिषद और नगर पंचायतों के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह से 28 फरवरी और 3 अप्रैल को मिले। हालांकि, मुख्यमंत्री ने इस फरमान को वापस लेने के निर्देश अतिरिक्त मुख्य सचिव शहरी विकास को दिए। इस आदेश के बावजूद 20 मई को अतिरिक्त सचिव शहरी विकास के माध्यम से अधिसूचना जारी हुई। जिसके तहत नगर परिषद के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष को 10 लाख से ज्यादा राशि के चेक पर हस्ताक्षर करने की स्वीकृति प्रदान की गई। मगर नगर परिषद और नगर पंचायत में तीन-चार लाख से ज्यादा का चेक कटता ही नहीं है। इधर, प्रदेश नगर निकाय निर्वाचित प्रतिनिधि संगठन के महासचिव गगन कश्यप का कहना है कि शहरी विकास मंत्री ने प्रदेश के नगर निकायों के निर्वाचित अध्यक्षों, उपाध्यक्षों के अस्तित्व को पूरी तरह से समाप्त करने का दायित्व उठा रखा है। उन्होंने कहा कि सरकार ने समय रहते यह आदेश वापस न लिया तो सरकार को इसके दूरगामी परिणाम भुगतने होंगे।

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