
नैनीताल। हाईकोर्ट ने सरकार को निर्देश दिए हैं कि राज्य में जाति प्रमाणपत्र 20 नवंबर 2001 के शासनादेश के आधार पर ही दिये जाएं। इस शासनादेश की परिधि में आने वाले लोगों को स्थाई नागरिक माना जाए। उक्त शासनादेश के तहत जाति प्रमाणपत्र उसी को दिया जाएगा जो शासनादेश की तिथि से 15 साल पहले 1986 से उत्तराखंड में निवास कर रहा हो। कोर्ट ने जाति प्रमाण पत्र मामले की सुनवाई के दौरान एकलपीठ के आदेश को चुनौती देने वाली स्पेशल अपील पर संशोधन करते हुए यह फैसला सुनाया।
मुख्य न्यायाधीश बारिन घोष और न्यायमूर्ति सर्वेश कुमार गुप्ता की संयुक्त खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। उत्तराखंड क्रांति दल के नेता त्रिवेंद्र सिंह पंवार व अन्य ने हाईकोर्ट में स्पेशल अपील दायर कर एकलपीठ के आदेश को चुनौती दी थी। एकलपीठ ने अपने निर्णय में कहा था कि उत्तराखंड की स्थापना के दिन 9 नवंबर 2000 से जो लोग उत्तराखंड में निवास कर रहे हैं, उन्हें जाति प्रमाणपत्र जारी किए जाए। साथ ही उन्हें उत्तराखंड का स्थाई निवासी माना जाए। स्पेशल अपील में कहा गया था कि जो लोग उत्तराखंड से बाहर के हैं उन्हें जाति प्रमाण पत्र जारी न किए जाएं क्योंकि इससे उत्तराखंड के आरक्षित वर्ग के लोग प्रभावित होंगे। पक्षों की सुनवाई के बाद न्यायालय ने एकलपीठ के आदेश को संशोधित करते हुए कहा कि 20 नवंबर 2001 के शासनादेश की परिधि में आने वालों को जाति प्रमाणपत्र दिया जाए।
