
काईस (कुल्लू)। पहाड़ों में प्राकृतिक तौर पर उगने वाली जड़ी-बूटियों का वजूद खतरे में पड़ गया है। इन बेशकीमती जड़ी-बूटियों की पांच दर्जन से अधिक प्रजातियों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अवैज्ञानिक तरीके से हो रहा इन जड़ी बूटियों का दोहन इनकी विलुप्तता के लिए खतरा है। ऐसे में इन औषधीय बूटियों का वनों से अस्तित्व ही मिट जाएगा। पूरे हिमालय क्षेत्रों में 1748 जड़ी बूटियों में से 339 पेड़ प्रजाति, 1029 शाखा और 51 टेरिटो थाईटस प्रजातियां हैं। हिमाचल प्रदेश में जड़ी बूटियों की करीब 645 प्रजातियां है। इसमें पतीश, रतनजोत, हाथ पंजा, सर्पगंधा, चिरायता, कुंठ, टिमर, कडू, चौरा, रखाल, वन हल्दी, वन ककड़ी, शीरा काकोली, निहाणी, निहाणू, धूप, लकड़ चूची, नाग छतरी आदि को विलुप्त श्रेणी में रखा है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने की होड़ में कुछ लोग अवैज्ञानिक तरीके से इनका दोहन कर रहे हैं। वन ककड़ी की जड़ों का उपयोग कैंसर के उपचार में होता है। इन दिनों घाटी के ऊंचे क्षेत्रों में चरस माफि या द्वारा भांग की खेती के लिए जंगलों में हजारों बीघा वन भूमि में भांग की खेती के लिए वनों का खोदा जा रहा है। पहाड़ों में उगने वाली इन बेशकीमती जड़ी-बूटियों के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो गया है।
एसपी कुल्लू विनोद धवन ने ऐसी शिकायतें मिलने की पुष्टि की है। पुलिस महकमा इस मसले पर गंभीरता से काम कर रहा है। ऐसे स्थानों को चिह्नित किया जा रहा है। भांग की पौधों को नष्ट करने के लिए विशेष टीम का गठन कर लिया है।
वन अरण्यपाल जीसी होजर ने बताया कि वन भूमि पर चरस की खेती और जड़ी-बूटियों का अवैज्ञानिक तरीके से हो रहे दोहन को रोका जाएगा। जीवी पंत हिमालयन पर्यावरण संस्थान के वैज्ञानिक डा. एसएस सांमत कहते हैं कि अवैज्ञानिक तरीके से हो रहा दोहन आने वाले समय में पर्यावरण के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। उनका कहना है कि जड़ी-बूटियों का दोहन बीजों के गिरने के बाद ही किया जा सकता है उन्होंने लोगों से जड़ी बूटियों के संरक्षण के लिए आगे आने की अपील की है।
