
देवभूमि कुल्लू कृषि और बागबानी के लिए मशहूर है। फल-सब्जियों ने ऊंचाइयां छू ली है। कुल्लू के किसान-बागबान परंपरागत खेती से पूरी तरह मुंह मोड़ चुके हैं। पौष्टिक तत्त्वों और प्रचुर कैल्यिशयम प्रदान करने वाले परंपरागत काऊणी, चीणी, काठू और कोदरा की खेती यहां लगभग विलुप्त हो गई है। जिला के किन्हीं कोने में ही अब इसकी खेती कम मात्रा में की जा रही है। बावजूद इसके सरकार की ओर से परंपरागत खेती का वजूद बचाने के लिए प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। आलम यह है कि अन्य नकदी फसलों को तरजीह देते हुए कई योजनाएं शुरू कर भारी अनुदान भी प्रदान किया जा रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो उपरोक्त अनाजों के सेवन से कई बीमारियां दूर होती है। जलोफरडाईसी और मधुमेह रोग के लिए तो यह परंपरागत अनाज औषधी रूपी माने जाते हैं। जिले में लगभग चार दशक पहले इन अनाजों की खेती जमकर की जाती थी। जबकि वर्तमान में इसकी खेती सिमट गई है। कृषि विभाग की मानें तो आजकल लोगों का रुझान नकदी फसलों की ओर बढ़ा है। नगदी फसलों से किसान-बागबानों को मुनाफा काफी मिल रहा है। इस वजह से पुराने खेती लुप्त होने की कगार पर है। जिला में गोभी, टमाटर, मटर, आलू, शिमला मिर्च अन्य कई सब्जियां उगाकर किसान अच्छी कमाई कर रहे हैं। जिला के किसान ओम प्रकाश, डाबे राम, कर्मचंद, खेम चंद आदि लोगों का कहना है वर्षों पहले काऊणी, चीणी, कोदरा और काठू की फसल घाटी में बडे़ पैमाने पर होती थी। कृषि विभाग के जिला विकास अधिकारी डा. धर्मपाल गौतम का कहना है कि किसानों की डिमांड पर शिमला से उपरोक्त अनाज को मंगवाया जाता है। काफी समय से इन अनाजों की पैदावार बिल्कुल कम हो गई है। यह अनाज बहुत गुणकारी है। जिला के दूर-दराज क्षेत्रों के किसी कोने में ही इसकी खेती हो रही है।
