

उत्तराखंड कैंपा की अधिसूचना जुलाई 2009 में जारी की गई थी। क्षतिपूर्ति वनीकरण, वन्य जीवों की सुरक्षा और वन प्रबंधन की अन्य जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कैंपा फंड का गठन 2006 में कर लिया गया था। इस फंड में 2006 से ही पैसा जमा भी होने लगा था। 2016 में केंद्र सरकार ने कैंपा अधिनियम बनाया और 2018 में इससे संबंधित नियम बने। 2018 में ही राज्य और केंद्रीय स्तर पर कैंपा फंड का गठन हुआ। इसके बाद 30 सितंबर को नए नियम लागू होने पर लंबित धनराशि के वापस मिलने के आसार बने। इस बीच राज्य सरकारों की ओर से लगातार कैंपा फंड के उपयोग की स्वीकृति देने की मांग भी की जाती रही। वन विभाग के मुताबिक केंद्र की ओर से 2019-20 का 213 करोड़ रुपये की वार्षिक योजना को भी अनुमोदित कर दिया गया है।इस धनराशि को वापस पाने के लिए लंबे समय से कोशिश की जा रही थी। बृहस्पतिवार को केंद्रीय वन मंत्री प्रकाश जावेड़कर की अध्यक्षता में हुई राज्यों के वन मंत्रियों की बैठक में भी यह मुद्दा उठाया गया था। केंद्रीय मंत्री ने इस पर साकारात्मक पहल का आश्वासन दिया था। इस धनराशि के मिलने से कैंपा की विभिन्न योजनाओं का संचालन बेहतर तरीके से हो सकेगा। इस धनराशि की मदद से पुनर्वास के मामलों को भी हल किया जाएगा।
– हरक सिंह, वन मंत्री उत्तराखंड
19 हजार हेक्टेयर वन भूमि में पौधरोपण किया
कैंपा के तहत प्रदेश में 19000 हेक्टेयर वन भूमि में पौधरोपण किया गया है। बारिश के पानी को बचाने के लिए 5152 तालाब (वॉटर होल) बनाए गए, जिनमें लगभग 15 लाख लीटर जल संचित किया गया। इसी योजना के तहत प्रदेश सरकार ने कोसी नदी को पुनर्जीवित करने के लिए व्यापक स्तर पर पौधरोपण भी कराया।
चीड़ के पेड़ों को काटने की अनुमति भी मांगी
भूमि हस्तांतरण का मुद्दा भी उठाया
वन मंत्री के मुताबिक बैठक में उन्हाेंने पांच हेक्टेयर तक की वन भूमि के हस्तांतरण का अधिकार प्रदेश सरकार को सौंपे जाने की भी मांग की। 2013 की आपदा के बाद यह अधिकार प्रदेश सरकार को दिया गया था। कुछ समय पहले ही यह अधिकार खत्म किया गया। अब सिर्फ एक हेक्टेयर तक की वन भूमि के अन्य प्रयोजनों के लिए हस्तांतरण का अधिकार प्रदेश सरकार के पास है। आपदा और विकास की जरूरत को देखते हुए प्रदेश सरकार को कम से कम पांच हेक्टेयर तक की भूमि के हस्तांतरण का अधिकार मिलना चाहिए। केंद्रीय वन मंत्री ने इस पर सकारात्मक पहल का आश्वासन दिया है।
