वोट दे दो मैडम पर टिकट मत मांगना

नई दिल्ली। चुनावी समर में कोई राजनीतिक दल राखी के बदले उपहार में प्याज देकर तो कोई सस्ते में प्याज उपलब्ध कराकर महिलाओं के वोट पाने की जुगत तो लगा रहा है, लेकिन उन्हें विधानसभा में भागीदारी देने के नाम पर सभी कन्नी काट रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनावों की तर्ज पर इस बार भी गिनी-चुनी महिलाओं को ही टिकट देने की रणनीति दलों ने तैयार की है। ये हालात तब हैं जब तीस वर्षों में मुख्यमंत्री की कमान अधिकांश समय महिलाओं के हाथ में रही। वोट देने के मामले में भले ही महिलाएं पुरुषों से पीछे नहीं हैं, लेकिन विधानसभा में इनकी भागीदारी पांच से सात फीसदी ही रहती है। इस बार भी राजनीतिक दलों के रुख में महिला प्रत्याशियों के प्रति कोई खास बदलाव नहीं दिख रहा है। सूत्रों के अनुसार, सभी दल करीब दस फीसदी या इससे कम महिला प्रत्याशियों को मैदान में उतारने की योजना बनाए हुए हैं। महिला आरक्षण विधेयक बिल राजनीतिक मकड़जाल में फंसा हुआ है। यह तो तब है जब शीला दीक्षित पंद्रह साल से लगातार मुख्यमंत्री हैं। इसके अलावा वर्ष 1998 में भाजपा की सुषमा स्वराज मुख्यमंत्री बनी थीं। वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव पर नजर दौड़ाई जाए तो भाजपा के टिकट पर सिर्फ चार महिला उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा, लेकिन जीत किसी को भी नहीं मिली। वहीं, कांग्रेस ने नौ उम्मीदवार मैदान में उतारी थीं। इनमें शीला दीक्षित समेत तीन को जीत हासिल हुई थी। वर्ष 1993 में भी कुल तीन महिलाएं विधानसभा पहुंची थीं, जबकि 1998 में शीला व सुषमा स्वराज समेत नौ और 2003 में कुल सात महिलाओं ने विधानसभा में एंट्री पाई थी। हालांकि, भाजपा कोर कमेटी की बैठक में प्रदेश भाजपा के चुनाव प्रभारी नितिन गडकरी ने कहा कि इस बार महिला उम्मीदवारों को तरजीह दी जाएगी। वही, भ्रष्टाचार व जन लोक पाल बिल के मुद्दे पर दिल्ली में पहली बार चुनाव लड़ने जा रही आम आदमी पार्टी के अभी तक घोषित 44 उम्मीदवारों में सिर्फ पांच महिलाएं हैं।

राजधानी की राजनीति में बड़ी महिला नेत्रियां
शीला दीक्षित, किरन वालिया, ताजदार बब्बर, बरखा सिंह, अंजलि राय, दीपिका खुल्लर, किरण चौधरी, डॉ. अनिता बब्बर, अनिता आर्य, सविता चौधरी, अलका लांबा, आरती मेहरा, पूनम आजाद, शिखा राय, कंवल जीत, वाणी त्रिपाठी, रजनी अब्बी।

Related posts