
उदयपुर (लाहौल-स्पीति)। लाहौल घाटी के किसान हॉप्स की खेती से मुंह मोड़ने लगे हैं। मार्केटिंग की समस्या के चलते किसानों का हॉप्स की खेती से मोह भंग हो गया है। कुछ समय से लाहौल के किसानों का रुझान सब्जी उत्पादन की ओर हुआ है। लाहौल घाटी के किसानों कहना है कि हॉप्स की पेमेंट उन्हें काफी समय बाद मिलती है। बताया जा रहा है कि इससे पहले हॉप्स का उत्पादन जम्मू-कश्मीर में होता था लेकिन वहां उग्रवादियों ने लड़ाई के समय हाप्स की लहलहाती खेती को नष्ट कर दिया। अब वहां भी खेती नहीं होती है।
लाहौल घाटी से भी हॉप्स की खेती मिटती जा रही है। हॉप्स से निकलने वाला एल्फाएसिड का इस्तेमाल वीयर में होता है। लाहौल हॉप्स सोसाइटी का ऐरोमैथिक फलोरा प्राइवेट लिमिटेड के साथ खरीददारी का करार है। लेकिन किसानों का रुझान सब्जी की तरफ बढ़ने से हॉप्स की खेती घटने लगी है। साल दर साल हॉप्स का उत्पादन गिर रहा है।
बागवानी विभाग के मुताबिक वर्ष 2010 में 26.5 मिट्रिक टन, 2011 में 19.1 मिट्रिक टन और 2012 में 16.8 मिट्रिक टन हॉप्स का उत्पादन हुआ था। इस बार काफी कम उत्पादन की संभावना है। किसानों का कहना है कि सरकार को हॉप्स उत्पादन को लेकर गंभीरता दिखानी होगी अन्यथा पूरे भारत मेें हॉप्स की खेती मिट जाएगी। बागवानी विभाग के कार्यकारी उपनिदेशक डा. सोनम ने भी माना कि सब्जियों के उत्पादन की तरफ किसानों का रुख होने से हॉप्स का उत्पादन कम हो रहा है।
