
जालंधर: एक तरफ तो भाजपा नरेंद्र मोदी के बल पर देश की सत्ता पर काबिज होने के लिए दौड़ लगा रही है लेकिन पार्टी के प्रदेश के नेता जनता की नब्ज को पकडऩे में लगातार असफल हो रहे हैं जिस कारण मोदी की सरपट दौड़ती रेल को ब्रेक लग सकती है। पंजाब में भाजपा व अकाली दल गठबंधन के पास 13 लोकसभा सीटें हैं। इन सीटों में से 3 सीटों पर भाजपा लड़ती है। प्रदेश में सत्ता सुख भोग रहे गठबंधन को 7वां वर्ष चल रहा है लेकिन इस समय प्रदेश में हर क्षेत्र में सरकार की नाकामी सामने आ रही है।
पंजाब में भाजपा की टीम में अधिकतर चेहरे नए हैं। इन चेहरों में से कुछ के पास तो भाजपा में काम करने का कोई अनुभव ही नहीं है। केवल ‘गणेश परिक्रमा’ के दम पर ये लोग भाजपा की प्रदेश टीम से लेकर सैल व मोर्चों में काम कर रहे हैं। केवल जगह भरने के चक्कर में अनुभवी नेता दरकिनार हो गए हैं जिस कारण प्रदेश में पार्टी चाह कर भी सक्रिय भूमिका नहीं निभा पा रही है।
आने वाले समय में भाजपा कोटे के चेयरमैन पदों पर भी आम वर्कर की जगह धनाढ्य या पहुंच वाले लोगों को आगे लाने की तैयारी चल रही है। ऊपर से भाजपा के कई नेता बादल परिवार के एहसानों तले इस कद्र दबे हैं कि शहरी जनता के पक्ष में बात तक नहीं रख पाते। ई-ट्रिप इसका एक उदाहरण है जिससे व्यापारी वर्ग न केवल पशोपेश में है बल्कि संघर्ष के लिए रणनीति तैयार कर रहा है, जबकि भाजपा के नेता मामला हल होने का दावा समय-समय पर करते रहे हैं।
यही नहीं, शहरी निगम क्षेत्रों में भी हालत कोई बेहतर नहीं है। जालंधर नगर निगम में ही मेयर सुनील ज्योति के कार्यकाल में विकास का कोई खास काम नहीं हुआ। 35 लाख रुपए की लागत से सड़कों पर पैचवर्क हुआ लेकिन वह एक एक बारिश में ही बह गया। ऐसे में कई पार्षद मामले को लेकर पहले ही हाईकमान को भ्रष्टाचार की संभावना से भरे पत्र लिख चुके हैं। शहर के 2 विधायक व एक मंत्री सरकार का हिस्सा हैं।
निकाय मंत्री का पद मिलने पर शहर के लोगों को उम्मीद थी कि शहर की नुहार बदल जाएगी लेकिन शहर की नुहार तो बदली नहीं, उलटा हालत बद से बदतर हो गई। भाजपा के अन्य मंत्री, संसदीय सचिव व विधायक भी भाजपा वर्कर की बात नहीं सुनते तथा शहरी वोटर की परवाह नहीं करते। इन सभी हालात को दरकिनार कर भाजपा के नेता 13 की 13 सीटें केंद्र भाजपा की झोली में डालने का दावा करते हैं, जबकि जमीनी सच्चाई कुछ और ही है।
