
हमीरपुर। सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत सूचना प्रदान करने में देरी पर राज्य सूचना आयोग ने सख्ती दिखाते हुए अधिकारियों और कर्मचारियों को 47 हजार रुपये का जुर्माना ठोका है। एक अधिकारी को आफिस मैनुअल के अनुसार फाइल नोटिंग तथा संरक्षण के निर्देश दिए, तो अपीलीय अधिकारियों को आरटीआई कानून के अनुसार मामलों की सुनवाई के निर्देश दिए। भविष्य में दोबारा नियम की उल्लंघना न करने की चेतावनी दी। मुख्य सूचना आयुक्त ने आरटीआई कार्यकर्ता ओंकार चंदेल की अपीलों पर सुनवाई के दौरान फैसला सुनाया।
चंदेल ने आबकारी एवं कराधान विभाग हमीरपुर से 7 दिसंबर 2012 को आवेदन देकर टौणी देवी में जब्त शराब के संबंध में सूचना मांगी थी। मामले में सूचना आयोग में अपील के बाद मुख्य सूचना आयुक्त ने सहायक आबकारी कराधान आयुक्त को सूचना आधी तथा जानबूझकर गलत देने का दोषी माना। इस पर आयोग ने संबंधित अधिकारी को 12500 रुपये का जुर्माना लगाया है। राशि दो समान किश्तों में सरकारी खजाने में जमा करवानी होगी। एक अन्य मामले में चंदेल ने वन मंडल अधिकारी के समक्ष 16 जनवरी 2013 को आरटीआई प्रार्थना पत्र दायर कर समताना बीट में बरामद किए लकड़ी के स्लीपरों का निरीक्षण करवाने का आग्रह किया था। विभाग ने निर्धारित समय के 64 दिनों बाद सूचित किया कि स्लीपर चोरी हो गए हैं। अपील पर सुनवाई के दौरान मुख्य सूचना आयुक्त ने संबंधित बीट के वन रक्षक को दोषी माना तथा सूचना में 64 दिनों की देरी पर 16 हजार रुपए का जुर्माना लगाया है। कर्मचारी को जुर्माना राशि चार बराबर किश्तों में जमा करवानी होगी।
ओंकार चंदेल ने 22 जनवरी 2013 को वन विकास निगम शिमला से कानून के तहत आवेदन कर सूचना मांगी थी लेकिन सूचना समय पर न प्राप्त होने के बाद मुख्य सूचना आयोग में अपील दायर की। मामले की सुनवाई में प्रस्तुत तथ्यों को देखते हुए मुख्य सूचना आयुक्त ने दो कर्मचारियों को सूचना में देरी के लिए दोषी माना। सूचना प्रदान करने में 53 दिनों की देरी के लिए 13250 रुपये का जुर्माना लगाया। दोनों कर्मचारियों को राशि सरकारी खजाने में जमा करवानी होगी। बिलासपुर जिला से संबंधित एक अन्य मामले में आयोग ने दोषी कर्मचारी को 5250 रुपए का जुर्माना लगाया है।
