दहेज प्रताड़ना का आरोप साबित होने पर सजा जरूरी : हाईकोर्ट

नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि दहेज प्रताड़ना के मामले में यदि युवती मरने से पहले पत्र में ससुराल पक्ष के खिलाफ कानूनी कार्रवाई न करने का आग्रह करे तो इसेे स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने ऐसे ही एक मामले में आत्महत्या करने वाली युवती के आग्रह को खारिज करते हुए पति को दहेज प्रताड़ना का दोषी माना है।
न्यायमूर्ति मुक्ता गुप्ता की अदालत ने फैसले में याची पति संजय दास को राहत प्रदान करते हुए उसकी सजा कम करके जेल में बिताई गई दो वर्ष अवधि के आधार पर उसे रिहा करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि मृतका ने अपने पत्र में स्पष्ट तौर पर प्रताड़ना का हवाला दिया है, लेकिन साथ ही पति व अन्य के खिलाफ कानूनी कार्रवाई न करने का भी आग्रह किया। अदालत ने कहा कि आरोप साबित होने पर उसके आग्रह को स्वीकार नहीं किया जा सकता, बल्कि दोषी को सजा देना जरूरी है।
अदालत ने संजय दास को आत्महत्या के लिए मजबूर करने के आरोप में राहत प्रदान करते हुए उसको निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सात वर्ष कैद की सजा रद्द कर दी। अदालत ने कहा मृतका का आरोपी से 29 नवंबर 1994 को विवाह हुआ था व उसकी मौत 13 मार्च 2001 को हुई। मृतका का जो पत्र पेश किया गया है वह मई 98 में लिखा गया है। इस पत्र में उसने ससुराल पक्ष पर कम दहेज मिलने पर उसे प्रताड़ित करने का हवाला दिया है। अदालत ने कहा मृतका की मौत वर्ष 2001 में हुई। वर्ष 98 से 2001 के बीच कोई शिकायत नहीं है। अभियोजन पक्ष यह स्पष्ट नहीं कर पाया कि युवती की मौत से पहले उससे दहेज मांगा गया या प्रताड़ित किया गया। ऐसे में यह नहीं माना जा सकता कि उसकी मौत दहेज की मांग के लिए हुई। इस आधार पर उसे इस आरोप में जिम्मेदार नहीं माना जा सकता।

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