ज्वालामुखी मंदिर में पांडुलिपियों के संरक्षण पर सवाल

ज्वालामुखी (कांगड़ा)। शक्तिपीठ ज्वालामुखी मंदिर में 200 वर्ष पुरानी पाकिस्तान से लाई गई पांडुलिपियों को मोदी भवन से हटा दिया गया है। इन पांडुलिपियोें में दीमक लग गई थी। अब सवाल यह भी उठा है कि शेष बची पांडुलिपियों की सुध अब कौन लेगा।  17 जनवरी के अंक में प्रमुखता से पांडुलिपियों की दुर्दशा के मुद्दे को प्रकाशित किया था। इसके बाद भाषा एवं सांस्कृतिक विभाग के निदेशक अरुण कुमार ने जांच के आदेश दिए थे। उन्होंने स्पष्ट किया था कि जिला भाषा अधिकारी मंदिर में पांडुलिपियों का जायजा लें और किन कारणों से दीमक लगी है, इसके बारे में भी अवगत करवाएं। बाद में लापरवाह अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई अमल में लाई जानी थी। बावजूद इसके अभी तक जिला भाषा विभाग सेे कोई भी अधिकारी ज्वालाजी मंदिर में जांच करने नहीं पहुंचा है। ज्वालाजी मंदिर में 20 से ज्यादा सुंदर नक्काशी युक्त फ्रेमों में पांडुलिपियां मोदी भवन में लगाई गई हैं, लेकिन पांडुलिपि संरक्षण मिशन के तहत करोड़ों रुपये खर्च करने वाला भाषा एवं संस्कृति विभाग इन प्राचीन धरोहरों को सहेजने में कितनी गंभीरता दिखा रहा है, इस बात का अंदाजा इस लापरवाही से लगाया जा सकता है। 17 जनवरी के बाद आज तक मंदिर में पांडुलिपियों की देखरेख करने के लिए कोई भी नहीं पहुंचा है। मंदिर न्यास के वरिष्ठ सदस्य भवानी दत्त का कहना है कि मंदिर में प्राचीन धार्मिक संस्कृति से रूबरू करवाने वाली पांडुलिपियों की रक्षा बेहद जरूरी है। इसके लिए भरसक प्रयास होने चाहिए तभी इन प्राचीन पांडुलिपियों की रक्षा हो पाएगी। वहीं, मंदिर अधिकारी तहसीलदार (अतिरिक्त कार्यभार) का कहना है कि मंदिर न्यास ने अपने स्तर पर पांडुलिपियों की सुरक्षा के लिए हरसंभव प्रयास किए हैं।

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