
मैहतपुर (ऊना)। उत्तराखंड के पहाड़ों पर प्रलय के बीच मौत को मात देकर ऊना के सात लोग सुरक्षित घर वापस लौटे तो अपनों से गले लगकर फफक-फफक कर रो पड़े। देहलां और मैहतपुर के छह महिलाएं और एक पुरुष 13 दिन बाद घर पहुंचे। अपनों को जिंदा देख परिजनों की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए। अपनों से गले लगकर काफी देर तक ये लोग रोते रहे। घर लौटी देहलां की 58 वर्षीय राजरानी, 59 वर्षीय संतोष, 50 वर्षीय कृष्णा देवी, निशा, 52 वर्षीय रक्षा देवी, 42 वर्षीय ऊषा रानी, 59 वर्षीय कृष्ण दत्त वशिष्ठ आदि ने आंखों देखा हाल सुनाया। उन्होंने बताया कि केदारनाथ जाते समय रास्ते में काफी लंबा जाम लगा हुआ था। उन्हें सुरक्षा कर्मियों और सेना ने रास्ते में ही रोक दिया। इसके बाद वे उत्तरकाशी के मिथानी होटल में जाकर ठहरे। उसके बाद वहां खतरे को भांपते हुए होटल स्टाफ ने किसी दूसरे होटल में जाने की सलाह दी। इस पर एक सुरक्षित होटल में वे पहुंचे। वशिष्ठ में बताया कि जिस होटल में वे पहले गए थे, उस होटल का कुछ ही देर में नामोनिशान मिट गया। जिस होटल में उन्हें शिफ्ट किया गया था, उसके स्टाफ ने भी उन्हें अलर्ट कर दिया था कि रात को सतर्क रहें। इस दौरान इन्होंने होटल में पूरी रात जागते हुए भजन कीर्तन में बिता दी। जब उन्हें केदारनाथ में भयंकर तबाही की खबर मिली तो इन्होंने उत्तरकाशी से ही वापस लौटना मुनासिब समझा। वापसी के दौरान रास्ते में एक रोटी की कीमत बीस रुपये और पानी की बोतल के 50 रुपये वसूले गए। एक रात गाड़ी में ही बितानी पड़ी। वापस लौटते समय उन्हें पता चला कि रास्ते में एक पुल बाढ़ में बह गया है। कुछ घंटों में सेना ने एक अस्थायी पुल तैयार किया। इस पुल के माध्यम उनकी कार आगे निकली। उस दौरान सरकार की ओर कोई मदद नहीं मिली। यदि सेना मदद को न आती तो वे सुरक्षित वापस न लौट पाते। इसके बाद वे हरिद्वार पहुंचे और ऊना के लिए निकले।
