
नई दिल्ली। दुष्कर्म के आरोप से कोई व्यक्ति समाज में अपमानित ही नहीं होता, बल्कि उसकी व उसके परिवार की प्रतिष्ठा भी दांव पर लग जाती है। ऐसे में अदालत की ड्यूटी बनती है कि वह फर्जी मामले में फंसाए गए व्यक्ति को संरक्षण प्रदान करे। यह जरूरी नहीं है कि दुष्कर्म के हर मामले में पीड़िता का बयान सही हो। हाईकोर्ट ने नौ वर्षीय लड़की से दुष्कर्म में मुमताज की सजा रद्द करते हुए यह टिप्पणी की।
न्यायमूर्ति जीपी मित्तल ने मुमताज को सजा देने संबंधी न्यायाधीश के फैसले पर नाराजगी जताते हुए कहा कि एएसजे जघन्य आपराधिक मामलों विशेषकर बच्चों से दुष्कर्म के मामलों की सुनवाई में अनुभवी होता है। वह स्वयं अंदाजा लगा सकता है कि अपराध हुआ है या नहीं। यह दुर्भाग्य की बात है कि संबंधित जज ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए गंभीर गलती की। उन्होंने कहा कि बच्ची व उसकी मां ने पहले छेड़छाड़ व मारपीट का आरोप लगाया था लेकिन अदालत में अचानक बयानों के दौरान मामले को नया मोड़ देते हुए मुमताज पर अपहरण व दुष्कर्म का आरोप लगा दिया। अदालत ने भी मां-बेटी के बयानों को स्वीकार कर मुमताज को 10 वर्ष कैद की सजा सुना दी। अदालत को पीड़िता के बयानों का मूल्यांकन करने के बाद ही कोई फैसला देना चाहिए। अदालत ने कहा स्पीडी ट्रायल का अर्थ यह नहीं है कि पीड़िता मात्र के बयान के आधार पर आरोपी को सजा सुना दी जाए, बल्कि अदालत के लिए यह देखना जरूरी है कि दुष्कर्म कानून के प्रावधानों का दुरुपयोग तो नहीं हो रहा है। इस मामले में आरोपी पर मामला छेड़छाड़ का दर्ज करवाया गया लेकिन सजा दुष्कर्म जैसे अपराध की मिली। उसे निष्पक्ष ट्रायल नहीं मिला। इसलिए वे मुमताज को सजा देने संबंधी फैसले को रद्द करते हैं।
ठोस साक्ष्यों के बिना न दी जाए सजा
हाईकोर्ट ने मुमताज को सजा देने वाले न्यायाधीश के कामकाज पर सवाल उठाते हुए कहा कि बिना किसी ठोस साक्ष्यों के किसी को सजा नहीं दी जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि मात्र पीड़िता के संदिग्ध बयान पर सजा देना गलत है। उन्होंने फैसले की प्रति सभी जिला अदालतों के न्यायाधीशों को भेजने का निर्देश देते हुए भविष्य में ऐसे मामलों में विशेष सावधानी बरतने का निर्देश दिया।
निर्दोष को संरक्षण देना अदालत का कर्तव्य
अदालत ने कहा कि हाल ही में देश की राजधानी में लोगों का अभूतपूर्व विरोध प्रदर्शन देखने को मिला। उन्होंने महिलाओं को सुरक्षित व गरिमा के साथ जीने के अधिकार की मांग की। समाचार पत्रों में राजधानी को बलात्कारी राजधानी बताते हुए दुष्कर्म पीड़िता की दुर्दशा पर प्रकाश डाला गया। इतना ही नहीं समाज के हर वर्ग ने आरोपियों को मृत्युदंड देने की मांग की। सरकार ने नागरिकों की चिंता के ध्यान में रखते हुए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया। अदालत का कर्तव्य है कि हर निर्दोष व्यक्ति को संरक्षण दे।
कानूनी सहायता बोर्ड में नियुक्त हों विशेषज्ञ वकील
अदालत ने कहा कि जमानती अपराध यानी छेड़छाड़ व मारपीट के आरोप के बावजूद आरोपी को जेल भेज दिया गया। उसके परिजनों को सूचना तक नहीं दी गई। इतना ही नहीं कानूनी सहायता बोर्ड द्वारा प्रदान वकील भी विशेषज्ञ नहीं था, जो आरोपी का बचाव कर सकता। अदालत, अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष उसे न्याय दिलवाने में फेल रहा। अदालत ने कहा कि कानूनी सहायता बोर्ड में जघन्य आपराधिक मामलों के विशेषज्ञ वकीलों को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि वे ऐसे मामलों में आरोपी बनाए गए गरीब अभियुक्तों की पैरवी कर सके।
