चुनाव लड़ने के लिए 20 पार्षदों ने बदला दल

पिछले विधानसभा चुनाव की भांति इस बार भी विभिन्न दलों के पार्षदों ने दल बदलने आरंभ कर दिए है।

मगर उनके दल बदलने का इतिहास कुछ अच्छा नहीं रहा है। पिछली बार 19 पार्षदों ने दल बदलकर भाजपा एवं कांग्रेस की शरण ली थी।

इन दोनों दलों ने पिछले नगर निगम चुनाव में उन्हें टिकट देने में कोई खास रुचि नहीं दिखाई थी। फिलहाल एक दर्जन पार्षद दल बदलकर भाजपा में शामिल हो चुके हैं।

आठ पार्षद अन्य दलों में शामिल हो गए। इस मामले में अभी कांग्रेस खाली हाथ है।

विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही लोकजनशक्ति, बीएसपी, जनता दल (यू) एवं एनसीपी के आधा दर्जन पार्षदों के साथ-साथ इतने ही पार्षद भाजपा में शामिल हो चुके हैं।

आम आदमी पार्टी, बसपा एवं जनता दल (यू) में भी आठ पार्षद शामिल हो चुके हैं। मगर अभी तक दल बदलकर कांग्रेस में कोई पार्षद शामिल नहीं हुआ है।

इनमें से कई पार्षदों को भाजपा ने विस टिकट देने का वादा किया है। देखने वाली बात यह है कि भाजपा दल बदलने वाले पार्षदों पर विस और भविष्य में होने वाले नगर निगम चुनाव में कितनी मेहरबान होती है।

पिछले विस चुनाव के दौरान भाजपा में आठ और कांग्रेस में 11 पार्षद शामिल हुए थे। मगर गत वर्ष नगर निगम चुनाव में ऐसे समस्त पाषदों को अपनी पार्टी से टिकट नहीं मिला।

भाजपा ने दो पार्षदों को टिकट नहीं दिया, जबकि छह टिकट लेने वाले पार्षदों में से तीन पार्षदों को जनता ने नकार दिया। इस तरह भाजपा में शामिल होने वाले तीन पार्षद ही चुनाव जीत सके।

दूसरी ओर कांग्रेस ने 11 पार्षदों में से दो पार्षदों को टिकट दिया था। इसके अलावा एक पार्षद की पुत्र वधू को चुनावी मैदान में उतारा।

यह तीनों ही कांग्रेस के चुनाव चिह्न पर जीत गए। कांग्रेस ने आठ पार्षदों को टिकट देने लायक नहीं समझा।

इनमें से तीन पार्षदों ने कांग्रेस से बागी होकर चुनाव लड़ा। इनमें एक पार्षद विनोद कुमार तो जीत गए, लेकिन दो पार्षदों को करारी हार का सामना करना पड़ा था।

विनोद कुमार अब आम आदमी पार्टी का दामन थाम चुके हैं और आप ने उसे विस का उम्मीदवार भी तय कर दिया है।

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