
कुल्लू। समय के साथ अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव का स्वरूप भी बदलने लगा है। पारंपरिक लोक नृत्यों के लिए प्रसिद्ध उत्सव से अब अधिकतर लोक नृत्य गायब हो चुके हैं। पहले रथ यात्रा में पुलिस का पहरा कम होता था। इसके अलावा करीब दो दशकों में दशहरा उत्सव में देवताओं की संख्या भी बढ़ी है।
कुल्लू कॉलेज के प्रोफेसर और दशहरे पर अध्ययन करने वाले डा. सूरत राम ठाकुर और पूर्व जिला भाषा अधिकारी सीता राम ठाकुर ने बताया कि दशहरा उत्सव में पहले देवता के साथ आए लोग सारी रात अस्थाई शिविर के पास लालड़ही और बांठड़ा नृत्य करते थे। अब इन नृत्यों का अस्तित्व खत्म होने की कगार पर है। देवताओं के अस्थाई शिविरों के बाहर देवलु पारंपरिक नृत्य नहीं करते।
दशहरे पर बुजुर्ग मौलू राम का कहना है कि उत्सव में लालहड़ी और बाठंड़ा नृत्य पूरी तरह खत्म हो रहे हैं। मौहले की रात को केवल चंदराऔली नृत्य ही देखने को मिलता है। अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव के दौरान देवताओं के स्थल में भी परिवर्तन आया है। प्रो. सूरत राम ठाकुर ने बताया कि देव मिलन समारोह में भाग लेने वाले देवताओं की संख्या लगातार बढ़ी रही है। जानकारी के अनुसार 1992 में इस देव समागम में करीब 119 देवताओं ने भाग लिया। गत वर्ष इस समागम में करीब 210 से ज्यादा देवी-देवताओं ने शिरकत की थी। देवी-देवता कारदार संघ के अध्यक्ष दोतराम ठाकुर का कहना है कि पहले लोगों को वापस जाने के साधन नहीं होते थे।
दशहरे में नहीं जलता रावण का पुलता
कुल्लू। देश भर में जब दशहरा उत्सव संपन्न होता है तो कुल्लू में उत्सव का आगाज होता है। कुल्लू में भगवान रघुनाथ की रथ यात्रा के साथ ही अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव का शुभारंभ किया जाता है। सातवें दिन भगवान रघुनाथ के अस्थाई शिविर से लंका दहन आयोजन स्थल तक भगवान रघुनाथ की रथ यात्रा निकलती है। लंका बेकर में लंका दहन के साथ अष्टांबलि दी जाती है। दशहरा उत्सव में रावण, मेघनाथ और कुंभकर्ण के पुतले नहीं जलाए जाते।
