
जोगिंद्रनगर (मंडी)। उनके हाथों के हुनर से लोग ही नहीं देवी-देवता भी झूम उठते हैं। लेकिन दूसरों को खुश करने वाले बंजतरियों को दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना तक मुश्किल हो गया है। हर शुभ अवसर पर शहनाई की मांगलिक धुनें भी वह बजाते रहे हैं लेकिन उनका मंगल अभी तक नहीं हो पाया। सरकारों की उपेक्षा के चलते हिमाचल की शान देव संस्कृति का मुख्य हिस्सा बंजतरी भी माने जाते हैं। लेकिन अब धीरे-धीरे इनकी संख्या घटने लगी है। जोगिंद्रनगर के लघु शिवरात्रि मेले में बजतंरियों ने कुछ इस तरह ही अपना रोष जाहिर किया।
मान सम्मान के नाम पर भी इनके हाथ हमेशा खाली रहते हैं। ऐसे में आस्था की डोर में बंधे इन वाद्य वृंदों का इस पुश्तैनी कार्य से मोह भंग होने लगा है। इस कारण बजंतरियों की नई पीढ़ी वाद्य यंत्रों बजाने से कतराने लगी है। आकर्षण और प्रोत्साहन न होने के कारण दिन प्रतिदिन बजंतरियाें (वाद्यवृंदों) की तादाद घट रही है। लघु शिवरात्रि देव मेला जोगिंद्रनगर में देवी देवताओं के साथ आए दर्जनाें बजंतरियों ने उपेक्षा की बात खुलकर कही। उन्होंने बताया कि देवताओं के प्रति आस्था से ही वह अभी तक इस पेशे से जुड़े हैं लेकिन, आर्थिक तंगी के चलते नई पीढ़ी का इस पेशे से मोह भंग होने लगा है। आस्था की डोर से बंध कर पीढ़ी-दर-पीढ़ी आस्था के इस पेशे को आगे बढ़ाते आ रहे बजंतरियों को दो जून की रोटी भी ढंग से नसीब नहीं होती। चौहारघाटी के देवताओं के साथ आए घासू राम, शहनाई वादन सूरजमणी तथा छिंजूराम तथा अन्य ने कहा कि वह पांच दशकों से शहनाई बजा रहे हैं। लेकिन शहनाई की मांगलिक धुन उनके जीवन में अभी तक खुशहाली नहीं ला पाई है। देवजू राम ने कहा कि वे तो जैसे तैसे आस्था के उजियारे में उपेक्षा और अंधेरे का जीवन ढोते आ रहे हैं लेकिन, अब उनकी अगली पीढ़ी का मत अलग है।
