ओबामा-करजई मुलाकात और अफगानिस्तान का धुंधला भविष्य

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के नेतृत्व में यहां तैनात अमेरिकी सैनिकों के अगले वर्ष वापस हो जाने के बाद देश के भविष्य पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से बातचीत करने के लिए सोमवार को अमेरिका रवाना हो गए।

करजई के कार्यालय ने यहां जानकारी दी कि दोनों देशों के बीच अफगानी सेना को नए किस्म के हथियार देने और उन्हें मजबूत बनाने पर चर्चा होगी। दोनों देशों के राष्ट्रपति सुरक्षा, आर्थिक स्थिति और राजनीतिक परिदृश्य के मुद्दे पर भी बातचीत करेंगे।

सवाल है कि अफगानिस्तान की फिलहाल जो स्थिति है इस संदर्भ में ओबामा से उनकी मुलाकात क्या रंग लाएगी ? देश से एक तरफ नाटो की वापसी हो रही है तो दूसरी तरफ वहां की पुलिस को जनता भरोसा जीतना है जो फिलहाल मुश्किल भरा है। वहीं देश पर गृहयुद्ध के बादल भी मंडरा रहे हैं।

गौरतलब है कि करजई इससे पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि नाटो के नेतृत्व वाले अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा सहायता बल (आईएसएएफ) का युद्ध अभियान 2013 के अंत तक समाप्त हो जाएगा। और अफगानिस्तान की सेना पूरे देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी सम्भालेंगी। इससे संबंधित बिल अमेरिका की सिनेट में भी पास हो चुका है जिस पर ओबामा की मुहर लग चुकी है।

करजई ने अफगानिस्तान के राजदूतों और राजनयिकों को संबोधित करते हुए कहा था कि नाटो के नेतृत्व वाली फौजें 2014 के अंत तक अफगानिस्तान छोड़ देंगी और उसके बाद अफगानिस्तान का विश्व के अन्य देशों के साथ रिश्तों में बदलाव आएगा। अफगानिस्तान से नाटो के नेतृत्व वाली विदेशी फौजों की वापसी एवं अफगानी सैनिकों को सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपने की प्रक्रिया 2011 के मध्य से शुरू हो गई थी।

वहीं दूसरी तरफ तालिबान का कहना है कि अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी सोवियत फौजों की वापसी जैसी ही है। अमेरिका अगले साल वहां से हट रहा है, जबकि सोवियत संघ ने 1989 में अफगान धरती छोड़ी थी।

तालिबान के चरमपंथी लड़ाकों ने “क्विक ग्लांस एट 2012” नाम से एक दस्तावेज जारी किया है जिसमें कहा गया है कि गठबंधन सेना अब लड़ने की इच्छा पूरी तरह खो चुकी है और व्यवहारिक रूप से निकलने और वापस लौटने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है। तालिबान ने कहा, “हम बिना किसी गलती के कह सकते हैं कि 2012 अफगानिस्तान पर कब्जे के लिए बिल्कुल वैसा ही है जैसा 1986 सोवियत संघ के कब्जे के लिए था।”

1986 को सोवियत सेनाओं के लिए अफगानिस्तान में उनकी 10 साल की मौजूदगी के लिहाज से मोटे तौर पर बदलाव का वक्त माना जाता रहा है, जब मुजाहिदिन के हमलों ने रूसी सेनाओं को रक्षात्मक रुख अपनाने पर विवश कर दिया और आखिरकार 1989 में उन्हें वापसी का रास्ता देखना पड़ा।

तालिबान ने इस दस्तावेज में यह भी लिखा है, “जब अमेरिका ने वियतनाम में भारी तबाही देखी तो उन्होंने जीत का एलान करने और वहां से भागने का फॉर्मूला अपनाया। यहां वे अफगानिस्तान के हाथ में सुरक्षा सौंप कर भागने का फॉर्मूला अपना रहे हैं। वास्तव में वे अफगानिस्तान से ठीक वैसे ही भागना चाहते हैं जैसे कि वे वियतनाम से भागे थे।”

यह बात गौर करने वाली है कि नाटो की गठबंधन सेना पिछले 11 साल से अफगानिस्तान में तालिबान लड़ाकों से लड़ रही है। दुनियाभर में हो रहे भारी विरोध और अमेरिकी अर्थ व्यवस्था के डूबने-उतरने की हालत में अमेरिका ने सैनिकों की संख्या में कटौती करने का ऐलान किया। इसके बाद 2013 में सैनिकों की संख्या में 30 हजार की कटौती कर दी गई और 2014 में युद्धक अभियान को पूरी तरह बंद करने का फैसला किया गया है। करीब एक लाख की तादाद में अंतरराष्ट्रीय सेना अब भी अफगानिस्तान में मौजूद हैं जो वहां की राष्ट्रीय सेना और पुलिस को प्रशिक्षण दे कर स्थिरता लाने की कोशिश में जुटी है।

लेकिन इसके दूसरी तरफ परिस्थितियां बिलकुल उलट है। अफगान की जनता लोकल पुलिस को सुरक्षा देने के लिहाज से अक्षम और तालिबान से सहानुभूति रखने वाला कहती हैं। अगले साल अमेरिकी सेना के लौटने के बाद देश में सुरक्षा की चुनौती का सामना अब अफगानिस्तान की लोकल पुलिस को ही करना है।

अफगानिस्तान लोकल पुलिस (एएलपी) का गठन 2010 में हुआ था जिसे अफगानिस्तान के कुछ बेहद खतरनाक और हिंसा प्रभावित दूर दराज के सीमांत इलाकों में काम संभालने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। वहीं, एएलपी का विरोध करने वालों की भी कमी नहीं है, लेकिन फिर भी कुछ जगहों पर इसने कुछ सफलताएं हासिल जरुर की है। देश के पूर्वी शहर जलालाबाद से करीब दो घंटे की दूरी पर पाकिस्तान की सीमा से 40 किलोमीटर दूर गोश्ता जिले में एएलपी के 200 जवानों वाली एक यूनिट पिछले दो महीने से तैनात है और इतने कम समय में ही इसकी मौजूदगी का असर दिखने लगा है।

इस बीच अफगान सरकार ने कुछ मध्यस्थों के माध्यम से तालिबान के साथ शांति वार्ता शुरू करने की भी कोशिश कर रही है। वहीं, गठबंधन नेताओं का कहना है कि अफगानों ने अब 75 फीसदी सैन्य जिम्मेदारियों को संभाल लिया है हालांकि अमेरिका उनसे 2014 के बाद भी एक छोटी सेना बनाए रखने की संभावना पर बातचीत कर रहा है।

नाटो और अमेरिकी अधिकारियों ने हाल के दिनों में भी कहा है कि स्थानीय सैनिकों और पुलिस को जिम्मेदारी सौंपने का काम सफलता से आगे बढ़ रहा है। राष्ट्रपति हामिद करजई ने भी कहा है कि कुछ ही दिनों में अफगान सुरक्षा बल देश की करीब 90 फीसदी आबादी को अपनी सुरक्षा में ले लेंगे। हालांकि जानकारों ने चेतावनी दी है कि नाटो सेना के जाने के बाद बड़े पैमाने पर देश में गृह युद्ध छिड़ सकता है।

वहीं दूसरी तरफ, अफगानिस्तान ने इस मसले पर भारत से भी सीधे तौर पर हस्तक्षेप करने की मांग की है भारत सरकार से सहायता मांगी है। इस मसले पर अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने भी हरी झंडी दे दी है। रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक इसमें उन्हें कोई विशेष समस्या नजर नहीं आती है। हालांकि, अधिकारी ने अपनी पहचान गुप्त रखने का आग्रह किया। वह एक भारतीय समाचार पत्र की खबर से जुड़े सवाल का जवाब दे रहे थे। इस खबर के मुताबिक, अफगान सेना के कमांडरों और खुफिया अधिकारियों ने देश के अनुभवहीन सैन्यबलों को सीधी सैन्य मदद देने के लिए भारत से आग्रह शुरू कर दिया है।

इसके साथ ही अफगान राष्ट्रीय सुरक्षाबल ने ढाई से सात टन तक भार ले जाने की क्षमता रखने वाले मध्यम आकार के ट्रकों के साथ कई प्रमुख सैन्य उपकरणों, पुल बांधने के उपकरणों, अभियांत्रिकी सुविधाओं, गोला बारूद एवं आयुध की भी भारत से मांग की है।

खबर के मुताबिक, अफगानिस्तान ने भारत से अपने बलों की वायु सैन्य क्षमताएं विकसित करने के लिए सहयोग का भी निवेदन किया है, ताकि 2014 में पश्चिमी सेनाओं की वापसी के लिए अफगान सैनिकों को तैयार किया जा सके। अधिकारी ने कहा कि अमेरिका और अफगानिस्तान ने एक ‘स्पष्ट सहमति’ वाली योजना विकसित की है, जिसमें अफगानिस्तान में विद्रोही गतिविधियों से उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सुरक्षा क्षमताएं विकसित करने के लिए सहयोग मिलने की बात शामिल है।

अफगानिस्तान का भविष्य क्या होगा, इसकी रुपरेखा फिलहाल तो धुंधली नजर आ रही है लेकिन अगर सबकुछ अच्छा रहा तो बेशक यह देश पाकिस्तान से बेहतर तरक्की कर करेगा।

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