
नगरोटा सूरियां (कांगड़ा)। वर्ष 1929 में बने कांगड़ा घाटी रेलमार्ग के निर्माण के बाद किसी भी सरकार ने इसकी सुध नहीं ली। यहां तक कि कांगड़ा घाटी की लाइफलाइन का 63 सालों के केंद्रीय रेल बजट में नाम तक शामिल नहीं किया गया। नतीजतन पठानकोट से जोगिंद्रनगर तक सभी छोटे बड़े रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ पौंग झील तो दूसरी तरफ विश्व प्रसिद्ध मसरूर मंदिर में सुगम यात्रा से सैलानियों को पहुंचाने वाले इस रेलमार्ग के नगरोटा सूरियां और गुलेर रेलवे स्टेशन पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण बन गए हैं।
रेलवे सूत्रों के मुताबिक दोनों स्टेशनों पर बजट के अभाव की मार के कारण मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पाई हैं। रेलवे स्टेशनों पर शौचालय तो बने हैं पर उनकी दशा दयनीय होने के कारण रेलगाड़ी की प्रतीक्षा में बैठे यात्रियों खासकर महिलाओं को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। विभाग सफाई कर्मचारी नहीं होने का अभाव बताकर इतिश्री कर लेता है। गुलेर रेलवे स्टेशन पर बने आवासीय भवनों की भी हालत खस्ता है। कई सालों से ये आवासीय भवन मरम्मत की राह ताक रहे हैं। पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण नगरोटा सूरियां और गुलेर रेलवे स्टेशनों के प्लेटफार्मों पर बने रेन शल्टरों का विस्तार भी जरूरी समझा जा रहा है। मौजूदा रेन शेल्टरों में 5 से 10 यात्री ही बारिश और धूप से बचने के लिए बैठ सकते हैं। बाकी यात्रियों को रेलगाड़ी आने तक इधर-उधर सिर छिपाना पड़ता है। दोनों ही रेलवे स्टेशनों पर एक-एक रेलवे विश्रामगृह की जरूरत भी महसूस की जा रही है।
बरसात के दिनों में जब भूस्खलन से गुलेर से कांगड़ा तक रेलमार्ग पर आवाजाही बंद हो जाती है तो विश्रामगृहों के अभाव में यात्रियों सहित रेलगाड़ी चलाने वाले ड्राइवरों व गार्ड को रात के समय परेशानी उठानी पड़ती है। कुल मिलाकर कांगड़ा घाटी के लोग पठानकोट-जोगिन्द्रनगर रेलमार्ग के विस्तार व सुधार के लिए 26 फरवरी को प्रस्तुत होने वाले केंद्रीय रेल बजट में प्रावधान के इंतजार में है। देखना यह है कि वर्ष 1929 से मरम्मत, विस्तार व सुधार के इंतजार में कांगड़ा घाटी की लाइफलाइन पर केंद्रीय रेल मंत्री पवन बंसल अपनी नजर इनायत करते हैं या नहीं।
