प्रति व्यक्ति आय घटने की आशंका, सरकारी स्तर पर किया जा रहा है मंथन

शिमला
सांकेतिक तस्वीर

सार

बेरोजगारी, मंदी समेत कई अन्य कारणों से इस बार हिमाचल प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय महज तीन फीसदी के आसपास ही बढ़ सकती है

विस्तार

 पिछले वित्त वर्ष में इसमें रिकॉर्ड 16,776 रुपये की बढ़ोतरी हुई थी लेकिन इस साल महज 5000 रुपये के आसपास ही बढ़ोतरी हो सकती है। बजट से पहले सांख्यिकी विभाग के अधिकारी इसके आकलन में जुटे हैं। हालांकि, ये आंकड़े घट-बढ़ भी सकते हैं। 25 फरवरी से शुरू हो रहे बजट सत्र के दौरान आर्थिक सर्वेक्षण की अंतिम रिपोर्ट सामने आएगी।

अंदाजा यह है कि इस बार प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 1 लाख 82 हजार रुपये के आसपास ही सिमटने के आसार हैं। रिपोर्ट सामने आने से पहले इस तथ्य ने उच्च अधिकारियों की चिंता बढ़ा दी है। फरवरी 2019 में भी प्रति व्यक्ति आय की रिपोर्ट को बजट सत्र के दौरान विधानसभा में पेश किया गया था। वित्तीय वर्ष 2018-19 की इस रिपोर्ट के अनुसार प्रति व्यक्ति आय 1,76,978 रुपये आंकी गई थी।

इससे पहले वित्तीय वर्ष 2017-18 में प्रति व्यक्ति आय 1,60,211 रुपये थी। इस तरह से वर्ष 2018-19 के वित्तीय वर्ष में यह बढ़ोतरी पिछले वित्त वर्ष से 10 फीसदी ज्यादा हुई। यह बड़ी बढ़ोतरी थी। अब वित्तीय वर्ष 2019-20 में इसके महज पांच हजार रुपये के आसपास बढ़ने के आसार बताए जा रहे हैं। आय घटने की आशंका के चलते सरकारी स्तर पर भी मंथन चला हुआ है। हालांकि, इस बारे में आंकड़ों को दोबारा टटोला जा रहा है।

ऐसे निकाली जाती है प्रति व्यक्ति आय

प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी का आकलन पिछले वित्तीय वर्ष के आंकड़ों को आधार बनाकर किया जाता है। इसके लिए ग्रास वैल्यू एडिड यानी सकल मूल्य वर्द्धित से कुल जनसंख्या को विभाजित कर निकाला जाता है। सकल मूल्य वर्द्धित आपूर्ति की तरफ से होने वाली आर्थिक गतिविधि है, जबकि सकल घरेलू उत्पाद उपभोक्ता की तरफ की आर्थिक गतिविधि है। जीवीए को जीडीपी में उत्पादों पर उपदान को शामिल करके और करों को घटाकर निकाला जाता है।

हिमाचल में सबसे बड़ा वर्ग कृषक, ऐसे में कैसे दोगुना होगी किसानों की आमदनी
हिमाचल में सबसे बड़ा वर्ग कृषकों का है। मोदी सरकार किसानों की आमदनी को 2022 तक दोगुना करने का एलान कर चुकी है। अगर प्रति व्यक्ति आय इसी रफ्तार से बढ़ती है तो वर्ष 2022 तक किसानोें की आमदनी दोगुना कैसे होगी। मुख्यमंत्री की कई बजट घोषणाओं और कई केंद्रीय योजनाओं के धरातल पर लागू न होने से ही यह हालात पैदा हो रहे हैं।

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