देव समाज में छुआछूत की प्रथा कायम

सुंदरनगर (मंडी)। भले ही उनकी मधु ध्वनियों पर देवता नाचते हों लेकिन उन्हें देवता का रथ छूने तक का अधिकार नहीं है। देवी-देवता बंजतरियों की धुनों के बिना एक कदम भी नहीं चलते। लेकिन उन्हें देवताओं को स्पर्श करने का अधिकार देव समाज नहीं देता। ऐतिहासिक और परंपरागत देवता मेला सुंदरनगर में छूआछूत की यह प्रथा फिर देखने को मिली। सरकारें भले हीं अपने स्तर पर छुआछूत खत्म करने के लिए हर साल सैकड़ों अभियान चलाती हों लेकिन देव समाज के कड़े नियम अभी तक इन अभियानों को आगे नहीं झुक पाए हैं।
देवताओं के आगे ढोल नगाड़े बजाते चलने वाले बजंतरियों के चेहरों पर देवताओं को स्पर्श करने की इच्छा इस बार भी साफ देखी गई। राजनेता भी इस सामाजिक बुराई के उन्मूलन के लिए मंचाें पर से लंबे चौड़े भाषण देते हैं, लेकिन इस पर्वतीय राज्य में आज भी यह सामाजिक बुराई पूरी तरह से समाप्त नहीं हो पाई है। सुंदरनगर में आयोजित होने वाले इस देवता मेले की रौनक देवी-देवताओं और उनके साथ आए कारिंदों से ही होती है लेकिन छुआछूत की यह प्रथा देखकर एक दुखद पहलु भी सामने आता है। यहां तक की जब वह अपने देवता के साथ किसी के आतिथ्य में जाते है तो वहां पर भी उन्हें अलग बर्तनों में ही खाना परोसा जाता है। देवी देवताओं के कारकूनों से इस संदर्भ में जब बात करनी चाही तो देव समाज के नियमों के विपरीत कोई भी खुलकर नहीं बोल पाया। देवी देवताओं को स्पर्श न करने के मलाल के चलते अब देवी देवताओं की संख्या भी बढ़ने लगी है। देवता मेले में एक ही नाम के दो से तीन देवी -देवता देखने को मिलने से इसका आभास होता है। बल्ह घाटी के अनेक क्षेत्रों से एक ही देवता के दो से तीन रथ मेले में शिरकत करने पहुंचे थे। जातपात में ऊंच -नीच के शिकार लोगों ने छुआछूत जैसी सामाजिक बुराई के चलते देवी देवताओं के अपने लिए नए रथ तैयार करना शुरू कर दिए हैं। ताकि वह जब चाहे अपने देव का स्पर्श कर सके और उनका आशीर्वाद पा सकें।

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