हिमाचल को कब मिलेगा पीजीआई जैसा संस्थान

शिमला(वीरेन्द्र खागटा)हिमाचल प्रदेश को भले ही स्वास्थ्य के क्षेत्र में अवार्ड मिला हो, लेकिन सुविधाओं को लेकर हकीकत ये है कि यहां एक भी मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट नहीं है। जन्म के बाद नवजात को बचाने के लिए आईसीयू और निको की सुविधा तक नहीं है। हेड इंजरी और अन्य गंभीर रोगों के इलाज के लिए यहां के मरीजों को पीजीआई चंडीगढ़ रेफर करना पड़ता है। हर साल दो से ढाई हजार गंभीर मरीजों को ऑपरेशन के लिए पीजीआई रेफर करना पड़ता है। बार्डर से सटे प्रदेश के मरीजों को पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड का रुख भी करना पड़ता है, लेकिन प्रदेश के नेताओं को इससे कोई सरोकार नहीं है। प्रदेश में किसी भी चुनाव में ‘स्वास्थ्य सेवाओं’ को कभी मुद्दा नहीं बनाया जाता। यही कारण है कि प्रदेश आज तक स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाया है।
सूबे में आज तक एक भी मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट नहीं है। शिमला में आईजीएमसी और कांगड़ा के टांडा में मेडिकल कॉलेज तो है, लेकिन इन दोनों ही कॉलेजों में सुपर स्पेशालिटी डाक्टरों की भारी कमी है। शिमला के आईजीएमसी में न्यूरो सर्जरी विंग मजबूत न होने के कारण घायल मरीजों का ठीक से इलाज तक नहीं हो पाता। महज एक डाक्टर के भरोसे न्यूरो सर्जरी का संचालन किया जा रहा है, जबकि हिमाचल एक पर्वतीय राज्य होने के कारण दुर्घटना से घायल होने वाले सबसे अधिक मरीज आईजीएमसी में पहुंचते है, लेकिन सुविधाओं के अभाव में उन्हें चंडीगढ़ रेफर करना पड़ता है। इतना ही नहीं बल्कि 30 से अधिक ऐसी बीमारियां है, जिनका प्रदेश में तो इलाज ही संभव नहीं है। ऐसे में मजबूर होकर डाक्टरों को इलाज के लिए मरीजों को दूसरे राज्यों में रेफर करना पड़ता है। तसवीर यह है कि प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही शासन करने का मौका मिला, लेकिन आज भी हिमाचल महज एक रेफरल स्टेट बनकर रह गया है।

पर्याप्त दवाइयां नहीं
हिमाचल प्रदेश में सुपर स्पेशलिस्ट डाक्टरों की ही नहीं बल्कि दवाइयों की भी भारी कमी है। सरकारी अस्पतालों में जीवन रक्षक दवाएं तक उपलब्ध नहीं हो पाती हैं। प्रदेश सरकार की ओर से आम लोगों को जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराने के दावे भी हवा हवाई हो चुके हैं। इसका लाभ उठाकर डाक्टर अस्पताल में आने वाले मरीजों को ब्रांडेड दवाएं लिखते नजर आते हैं।

एक करोड़ मरीज आते हैं ओपीडी में
हिमाचल के सरकारी अस्पतालों में पूरे साल के दौरान लगभग एक करोड़ के आसपास ओपीडी होती है। जबकि, प्रदेश की आबादी 2011 की जनगणना के अनुसार 68 लाख के आसपास ही है। इनमें बाहर से आने वाले लोग भी शामिल हैं। यह भी हो सकता है कि एक व्यक्ति साल में दो या तीन बार सरकारी अस्पताल पहुंचता हो।

311 भवन अधूरे, 127 को जमीन ही नहीं मिली
2009 से 2013 के बीच में 734 स्वास्थ्य भवनों के निर्माण की स्वीकृति प्रदान की है। इसमें से 268 भवनों का निर्माण हो पाया है, लेकिन 311 कार्यों का काम आज भी आधा अधूरा पड़ा है। 127 काम शुरू ही नहीं हो पाया है। इसका मुख्य कारण यह है कि स्वास्थ्य विभाग की ओर से अभी तक लोक निर्माण विभाग को जमीन ही उपलब्ध नहीं कराई गई है।

कोट्स
निश्चित तौर पर प्रदेश में सुपर स्पेशलिस्ट डाक्टरों की आईजीएमसी और टांडा में कमी है, जिसे पूरा करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। जहां पर संसाधन नहीं है, उसे उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। दवाओं की प्रदेश में कोई कमी नहीं है। – कौल सिंह ठाकुर, स्वास्थ्य मंत्री हिमाचल प्रदेश

2007 में भाजपा ने जब सत्ता संभाली थी। उस समय प्रदेश का बुरा हाल था, लेकिन पांच साल में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर करने की पूरी कोशिश की गई। सुपर स्पेशलिस्ट डाक्टरों को भी रखा गया, लेकिन कोई डाक्टर टिकने के लिए तैयार नहीं है। इससे निश्चित तौर पर मरीजों को पूरी सुविधाएं नहीं मिल पाती। -नरेंद्र बरागटा, पूर्व स्वास्थ्य मंत्री

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