कैसे हो रहे फर्जी फर्माें को लोन पास?

मैहतपुर (ऊना)। बाहरी राज्यों से हिमाचल में आकर अपना कारोबार शुरू करने के नाम पर लाखों रुपयों के लोन कैसे पास हो रहे हैं? कैसे फर्माें की पूरी तफ्तीश नहीं की जाती और किस प्रकार बैंकों को चूना लगाकर कारोबारी रफू चक्कर हो जाते हैं, यह बड़ा सवाल है। इस पूरे प्रकरण में डीआईसी की कारगुजारी पर भी सवालिया निशान लग रहे हैं। हालांकि डीआईसी ने इस तरह के मामले की जांच की बात कबूल की है।
विभागीय सूत्रों ने बताया कि जब भी कोई नई फर्म उनके संपर्क में आती है तो उस फर्म की सर्वप्रथम रजिस्ट्रेशन की जाती है। प्रोजेक्ट रिपोर्ट एवं प्रोपोजल तैयार होती है। विभागीय टीम फर्म की मौके पर जाकर जांच करती है। अन्य कागजी औपचारिताओं को पूरा करने के बाद ही केस को मंजूरी के लिए भेजा जाता है। सूत्रों की मानें तो फर्म को उस वक्त तक लोन में से सब्सिडी नहीं मिलती, जब तक बैंक एवं वित्तीय संस्थान को यह तसल्ली नहीं हो जाती कि फर्म कारोबार कर रही है। मैहतपुर के साथ लगते रायपुर सहोड़ां गांव में फोटो एलबम तैयार करने के लिए जिस फर्म को बैंक ने लोन मंजूर किया था, बैंक मैनेजर के मुताबिक वह डीआईसी द्वारा स्वीकृत केस था। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या डीआईसी ऐसे मामलों में गहनता से जांच पड़ताल नहीं करती? क्या विभाग ने दिल्ली की जिस फर्म का केस स्वीकृत किया और लोन के लिए मैहतपुर की पटियाला बैंक शाखा को भेजा उस फर्म के काम की समीक्षा विभागीय टीम ने की थी? बताते चलें कि 12 अगस्त 2010 में अपना कारोबार शुरू करने के लिए दिल्ली की एक फर्म ने 10 लाख की लिमिट बनवाई थी। कुछ महीनों बाद पता चला कि उक्त फर्म तो रायुपर सहोड़ां में है ही नहीं। बैंक प्रबंधन ने फर्म के रायपुर सहोड़ां के पते पर कानूनी नोटिस भी भिजवाए, जोकि फर्म का वहां कोई अता-पता न के कारण तकसीम ही नहीं हो सके। दूसरे पते राजेन्द्रा नगर नई दिल्ली में अब बैंक प्रबंधन उक्त उद्यमी की पिछले चार साल से खोजबीन कर रहा है।

पता लगाएंगे, कैसे मंजूर हुआ लोन
डीआईसी के प्रबंधक अमीचंद अत्री ने कहा कि उनके ध्यान में यह मामला ‘अमर उजाला’ के जरिये ही सामने आया है। कहा कि वह इस मामले की जांच करके पता लगाएंगे कि उक्त फर्म ने किस आधार पर लोन मंजूर करवाया था, और वहां पर फर्म काम क्यों नहीं कर रही है?

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