यहां रथ से भी पहचाने जाते हैं देवी-देवता

मंडी।(ओम प्रकाश) अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव भव्य देव समागम के लिए विख्यात है। जनपद के ग्रामीण अंचलाें से अपने- अपने रथों पर सवार होकर शिवरात्रि में आने वाले देवी देवताआें की विविध तरह की रथ शैलियां मेले का प्रमुख आकर्षण हैं। करीब दो सौ देवी और देवता हजारों देवलुओं के साथ पड्डल मैदान में हर रोज कतारबद्ध होकर बैठते हैं।
यहां रथ शैलियों के दर्शन भी शिवरात्रि के दौरान होते हैं। बल्ह घाटी की रथ शैली के देवी तथा देवताओं में देव सायरी, कांढी बाला कामेश्वर, देव टिक्कर, भगवती मनसा, कोयला भगवती, देव भंगरोही के रथ इस शैली के बने हैं। इसमें देवी के रथ में आठ या इससे अधिक मुखौटे लगे होते हैं। जबकि, देवता के रथ पर चार मुखौटे लगे होते हैं।
इसी तरह सनोर बदार की रथ शैलियों में राजतंत्र के समय के देवता शुकदेव ऋषि थट्टा, देव बरनाग, गणपति और देवी नाऊ अंबिका, देवी चंडी के रथ इस शैली के बने हुए है। देवी के रथ थोड़े ढलवां होने के अलावा उनके ऊपर छत्र होता है। देवता के रथ का मंडप गोल होता है। इसके ऊपर सोने या चांदी का डोडा लगा होता है। देवता के रथ पर चार मुखौटे होते हैं। उसी प्रकार चौहार घाटी के देवता अपनी अलग पहचान बनाते हैं। इनके मंडप सफेद कपड़े की छोटी छोटी कतरनों से सजे होते हैं। इनके मुखौटे भी चार लगे होते हैं। जबकि देव आदि ब्रह्मा का रथ कुल्लवी शैली का बना हुआ है। बालीचौकी क्षेत्र के देवता छानणु छमाहूं के रथ भी कुल्लू घाटी के देवी देवताओं के रथों से मेल खाते हैं। देव मगरू महादेव का रथ भी अपनी विशिष्ट शैली के लिए प्रसिद्ध है। शोधार्थियों के लिए यह रोमांच का विषय भी है।

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