
कांगड़ा। डा. राजेंद्र प्रसाद मेडिकल कॉलेज टांडा में पहली बार कोकलियर इंप्लांट की सफल सर्जरी हुई है। नूरपुर की सवा दो साल की बच्ची को यह इंप्लाट स्थायी तौर पर लगाया गया है। शुक्रवार को सरगंगा राम अस्पताल दिल्ली के डा. शालभ शर्मा और टांडा मेडिकल कॉलेज के ईएनटी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. मनीष ने इस सफल सर्जरी को संयुक्त तौर पर अंजाम दिया है। इस सर्जरी के बाद मेडिकल कॉलेज के इतिहास में एक और तमगा लग गया है। तीन सप्ताह बाद इस उपकरण को स्विच ऑन किया जाएगा। इसके बाद स्पीच रिहेबिलेशन के बाद बच्ची धीरे-धीरे और उसके बाद बेहतर सुनने और बोलने में सक्षम हो सकेगी। कोकलियर इंप्लाट की हुई सफल सर्जरी के बाद टांडा में बहरेपन के रोगियों का इलाज संभव हो गया है। इस बीमारी से संबंधित मरीजों को बाहरी राज्यों में इलाज के लिए नहीं जाना पड़ेगा। डा. मनीष सरोच ने बताया कि बहरेपन के शिकार पैदायशी बच्चों से लेकर जो किसी बीमारी के बाद सुन सकने में नाकाम हो चुके हैं, उनका इलाज इस तकनीक के माध्यम से किया जा सकता है।
इससे पहले मेडिकल कॉलेज टांडा में कोकलियर इंप्लांट सर्जरी पर आयोजित कार्यशाला का शुभारंभ कॉलेज प्राचार्य डा. अनिल चौहान ने किया। सर गंगाराम अस्पताल के कोकलियर इंप्लाट विशेषज्ञ डा. शालभ शर्मा ने मेडिकल साइंस की इस नवीनतम तकनीक पर अपने विचार रखे। ईएनटी विशेषज्ञों की ओर से कोकलियर इंप्लाट पर लाइव वीडियो सर्जरी भी दिखाई गई। चर्चा रही कि मेडिकल साइंस अब इस नतीजे पर पहुंच चुकी है कि विश्व में अब कोई भी बहरा या गूंगा नहीं रहेगा।
क्या है कोकलियर इंप्लाट
वास्तव में यह उपकरण मेडिकल लाइन की परिभाषा में बायोनिक ईयर है। इसमें माइक्रोफोन, स्पीच प्रोसेसर, ट्रांसमीटर, रिसीवर स्टीमूलेशन और इलेक्ट्राड्स होते हैं। इसे कान के भीतरी हिस्से में लगाया जाता है।
इतनी आएगी लागत
इस इंप्लांट की लागत पांच लाख 38 हजार से 11 लाख 58 हजार तक पहुंचती है। हिमाचल प्रदेश सरकार जन्मजात बहरे रोगियों के लिए बाल सुरक्षा योजना के तहत पांच लाख 38 हजार चरणवद्ध तरीके से उपलब्ध करवा रही है। बाहरी राज्यों में इंप्लांट की लागत के अलावा सर्जरी पर एक से सवा लाख का खर्च हो जाता है। मरीजों की सर्जरी का यह खर्च यहां बच जाएगा।
