
खराहल (कुल्लू)। कुल्लू के विभिन्न इलाकों में सेब बगीचे में स्टेम बोरर नामक बीमारी की चपेट में आ गए हैं। इस बीमारी का कहर इन दिनों प्रूनिंग के समय साफ दिखाई दे रहा है। बगीचोें को संवारने में जुटे बागवान इस बीमारी को लेकर खासे चिंतित हैं। कीड़े के प्रकोप से पौधे की मुख्य टहनी अंदर ही अंदर खोखली हो रही है। परिणामस्वरूप कुछ अरसे बाद पौधा सूखने लग जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है मादा कीट सेब पौधों में टहनी में छेद करके अंडे देती है और एक सप्ताह में अंडों के फूट जाने से डिबक बन जाता है। यह डिबक अंदर ही अंदर पेड़ों को खाकर नुकसान पहुंचाता है और बाद में सेब का पौधा सूख जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बीमारी पर पूरी तरह काबू पाया जा सकता है इसके लिए बागवानों को सावधानी बरतनी होगी। कहा कि स्टेम बोरर तीन किस्म का होता है। कुल्लू में 1942 में पहली बार एलीस्थिज नामक कीट देखा गया था। यह कीट टहनियों के अंदर पांच से सात सेंटीमीटर चौड़ा एक छेद बनाकर इसे अंदर से ही खाकर खोखला कर देता है। घाटी के बागवान अमित, योगराज, सुरेश, संजीव तथा अखिल राणा का कहना है कि इन दिनों सेब बगीचों में स्टेम बोरर का कहर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इस बीमारी से कई सेब के पौधे सूखने लगे हैं। बागवानी विश्वविद्यालय नौणी के मुख्य कीट विशेषज्ञ डॉ. जेपी शर्मा कहते हैं कि स्टेम बोरर पर पूर्ण रूप से नियंत्रण पाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि रूई के फाहे को पेट्रोल से गीला कर छेद में डालकर उसे बंद करना चाहिए। सर्दियों में डरमट और डसबान दवा 15 मिली प्रति दस लीटर पानी में मिलाकर पौधों केे तौलियों में डालने से कीट के प्रकोप से राहत पाई जा सकती है।
