
हल्द्वानी। हेमपुर डिपो में क्लच वायर में फंसकर मरी बाघिन की जान बच सकती थी। वनाधिकारियों के अनुसार क्लच वायर में फंसने के बाद जब तार कसा होगा, तो बाघिन खूब दहाड़ी होगी। घंटों संघर्ष के बाद उसने दम तोड़ा होगा, पर चौंकाने वाली बात यह है कि पास में पीपलपड़ाव गांव के लोगों ने आवाज सुनी और न सैन्य कर्मियों ने। ऐसे में वन महकमा का संदेह गहरा गया है। विभागीय अधिकारियों के अनुसार अगर समय पर सूचना मिल जाती, तो संभवत: रेस्क्यू कर जान बचाई जा सकती थी। उधर, शुक्रवार को तराई केंद्रीय वन प्रभाग की टीम ने लामाचौड़ में ऐसे ही वायर में फंसे तेंदुए को कुशलता पूर्वक रेस्क्यू किया था।
वन्यजीव से जुड़े लोगों के अनुसार शिकार के लिए सबसे सस्ता और प्रभावी तरीका क्लच वायर है। क्लच वायर के फंदे में जब वन्यजीव फंसता है और निकलने की जितनी कोशिश करता है, वह उतना तेजी से कसता जाता है। क्लच वायर जहां भी फंसा होता है, वहां पूरा काट देता है। वन महकमे से जुड़े लोगों के अनुसार जब बाघिन फंसी होगी, तो उसने निकलने को घंटों संघर्ष किया होगा। ऐसे वक्त में बाघिन हो या कोई दूसरा वन्यजीव पूरी ताकत से चिल्लाते हैं। ऐसे में आवाज आसपास के इलाके में जरूर गई होगी, पर चौंकाने वाली बात यह है कि पास में पीपल पड़ाव गांव के लोगों न आवाज सुनी और न ही हेमपुर डिपो के कर्मचारियों ने, जबकि शुक्रवार को ही लामाचौड़ जंगल में फंसे एक तेंदुए को नैनीताल जू और तराई केंद्रीय वन प्रभाग की टीम ने डा. पराग मधुकर धकाते के निर्देशन में आपरेशन चलाकर सुरक्षित निकाला था। डीएफओ राहुल कहते हैं कि बाघिन क्लच वायर में फंसने पर निश्चित तौर पर दहाड़ी होगी, अगर लोग सूचना देते, तो संभवत: हम बाघिन को रेस्क्यू कर बचा सकते थे।
कई बार हो चुकी हैं डिपो में घटनाएं
हल्द्वानी। हेमपुर डिपो में इस बार ही वन्यजीवों के शिकार की घटना नहीं हुई है। इससे पहले भी अति सुरक्षित कहे जाने वाले इलाके में वन्यजीवों का शिकार हुआ है। मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं परमजीत सिंह कहते हैं कि 2012 में चार शावकों की जलकर मौत हुई, इससे पूर्व जनवरी 2010 में हेमपुर डिपों में इसी तरह क्लच वायर में फंसकर तेंदुए का शिकार हुआ। करीब आठ साल पहले भी इसी इलाके में एक बाघिन का गोली मारकर शिकार किया गया था। लगातार सैन्य इलाके में होने वाली घटनाएं चिंता का विषय है। शिकारी आराम से सैन्य इलाके में शिकार कर रहे हैं। इससे सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़ा हुआ है। सिंह कहते हैं मातहत अधिकारियों को कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। 17 दिसंबर 2011 को तराई पूर्वी वन प्रभाग के किलपुरा रेंज में भी तेंदुए के फंदे में फंसकर मौत के मामले में सैन्य अधिकारियों के खिलाफ वाइल्ड लाइफ एक्ट में मुकदमा दर्ज हुआ था।
