
बिलासपुर। स्कूली छात्राआें की नेशनल हैंडबाल प्रतियोगिता में अन्य तमाम व्यवस्थाएं भले ही उम्मीदों के अनुरूप रही हों, लेकिन चैंपियनशिप के एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू को संभवतया अधिक गंभीरता से नहीं लिया गया। टूर्नामेंट में कई मैचों में रेफरियों में तालमेल का अभाव नजर आया। वीडियो रिकार्डिंग की व्यवस्था न होने से भले ही इसे चुनौती नहीं दी जा सकती हो, लेकिन रेफरियों के बीच तालमेल की कमी से कई टीमें खिन्न नजर आईं। यहां तक कि कई मौकों पर दर्शक भी रेफरियों के फैसलों पर हंसते दिखाई पड़े।
बिलासपुर में गत 16 दिसंबर से शुरू हुई लड़कियाें की अंडर-17 व अंडर-19 स्कूली नेशनल हैंडबाल चैंपियनशिप आखिरी पड़ाव में पहुंच चुकी है। देश के विभिन्न राज्यों से यहां पहुंची टीमाें ने रहने व भोजन आदि की व्यवस्थाआें के साथ ही मैदानों पर भी संतोष जताया। नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर कुछ टीमाें के प्रशिक्षकाें ने कहा कि कोई टीम चाहे कितनी ही मजबूत क्यों न हो, रेफरियों की भूमिका भी बेहद अहम रहती है। राष्ट्रीय स्तर के इस टूर्नामेंट में कुछ रेफरियों ने अपना दायित्व बखूबी निभाया, लेकिन कई मैचाें में रेफरियाें में आपसी सामंजस्य का अभाव साफ तौर पर नजर आया। एक रेफरी कुछ और, जबकि दूसरा कुछ अलग इशारा करता रहा। एक गोल का इशारा करता था तो दूसरा उसे फाउल बता देता था। इससे खिलाड़ियाें की लय के साथ ही उनके मनोबल पर असर पड़ना स्वाभाविक है।
उधर, इस बारे प्रतियोगिता के सहायक संगठन सचिव अनंतराम शर्मा ने कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है। मैचों के लिए क्वालीफाइड रेफरियों की सेवाएं ली जा रही हैं। आब्जर्वर से पूछकर ही उन्हें मैचाें का दायित्व सौंपा गया। वहीं, स्कूली गेम्स फेडरेशन आफ इंडिया से आए आब्जर्वर अमित कुमार ने इस बारे पूछने पर व्यस्तता का हवाला देते हुए बाद में बात करने को कहते हुए एक तरह से इस मामले से पल्लू झटक लिया।
