
अल्मोड़ा। भारी भरकम बजट और अधिकारियों, कर्मचारियों की फौज के बावजूद वन पंचायतों की सुरक्षा का जिम्मा वन विभाग का नहीं है। वन पंचायतों की देखरेख और अतिक्रमण रोकने की जिम्मेदारी साधनहीन वन पंचायतों पर डाल दी गई है जिनके पास एक भी कर्मचारी नहीं होता। वन विभाग के उदासीन रवैये के चलते वन पंचायतों की भूमि में धड़ल्ले से अतिक्रमण और कब्जे हो रहे हैं, लेकिन विभाग को यह तक नहीं मालूम कि कितने क्षेत्र में अवैध कब्जे हैं। आरटीआई में पूछे गए सवाल के जवाब में वन विभाग ने कहा है कि अतिक्रमण रोकने की जिम्मेदारी वन पंचायतों की है।
जिले में 2199 वन पंचायतें हैं। इनका क्षेत्रफल 69853.65 हेक्टेयर है। पर्यावरण और वन संपदा के लिहाज से महत्वपूर्ण वन पंचायतों की सुरक्षा और संवर्धन की जिम्मेदारी वन विभाग की नहीं है। विभाग ने पंचायतों में अतिक्रमण रोकने को सरपंचों और प्रबंध समिति को जिम्मेदार बताया है। सूचना अधिकार अधिनियम में अल्मोड़ा वन प्रभाग ने यह जानकारी दी है। विभाग का कहना है कि उत्तरांचल पंचायती वन नियमावली-2005 की धारा 19 (ग) के प्राविधानों में वन पंचायतों में अतिक्रमण रोकने की जिम्मेदारी सरपंच और वन पंचायतों प्रबंध समिति की है। कब्जे और अतिक्रमण रोकने, हटाने के लिए वन पंचायतों को पर्याप्त शक्तियां दी गई हैं। विभाग को वन पचायतों में हुए अतिक्रमणों और बेदखली की कोई जानकारी नहीं है।
विभाग का कहना है कि अतिक्रमण रोकने समेत अन्य कर्तव्यों के निर्वहन में प्रबंध समिति या किसी सदस्य के असफल रहने पर उसे हटाया जा सकता है। धारा 39 में जिलाधिकारी स्वयं या परगना मजिस्ट्रेट से अथवा अन्य अधिकारी से जांच कर प्रबंध समिति को अपदस्थ किया जा सकता है। वन विभाग से मिली सूचना के मुताबिक वन पंचायतें पूरी तरह प्रबंध समिति के रहमोकरम पर हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि कब्जेदारों के खिलाफ साधनहीन वन पंचायतें किस प्रकार कार्रवाई करेंगी या यह यूं भी हो सकता है कि वन पंचायतों को झांसे में लेकर वन पंचायतों में आसानी से अतिक्रमण किया जा सकता है। मालूम हो कि सड़कों के इर्द-गिर्द दर्जनों वन पंचायतों की भूमि में लोगों ने कब्जा ही नहीं किया है बल्कि बड़े होटल और भवन भी बना लिए हैं। कुछ सरपंचों की सक्रियता से संबंधित क्षेत्र में हुए अतिक्रमण के मामले न्यायालय में लंबित हैं। किसी भी वन पंचायत को भूमि में हुए अतिक्रमण की बेदखली की कोई जानकारी नहीं है।
